Feb 9, 2010

राहुल अब परिपक्व हो रहे हैं ?

राहुल गाँधी लगता है अब राजनीती में परिपक्व हो रहे हैं | राहुल को पहले शायद राजनीती में बच्चा माना जाता था  लेकिन अब राहुल इस जगह पे सही दिख रहे हैं | राहुल पहले कभी भी कुछ बयान दे देते थे और उन्हें दूसरे विरोधी दलों की किरकिरी का सामना करना पड़ता था | राहुल ने अभी हाल के बिहार दौरे के बाद इस बात को साबित कर दिया है की वो अब समझदार हो गए हैं | राहुल ने बिहार दौरे पे मुंबई में शिवसेना और राज ठाकरे के द्वारा जारी हिंसा का जमकर जबाब दिया है जो इस बात का साबुत है की राहुल अब हर कुछ सोच समझकर कर रहें हैं | राजनीती में सब कुछ ऐसे तरह से करने होता है की चुनाव में जीत मिल जाए | राहुल ने भी ऐसा ही कुछ किया है | कुछ दिन पहले महाराष्ट्र चुनाव के समय राहुल ने कुछ भी मुंबई को लेकर शिवसेना और राज के बातो का जबाब नहीं दिया ,लेकिन जैसे ही बिहार और उत्तरप्रदेश के चुनाव नजदीक आ रहे हैं राहुल ने यह बयान दिया है की मुंबई किसी की जागीरदार नहीं है | राहुल को समझने वाले अब यह जान चुके हैं की राहुल अब नए तरह की राजनीती कर रहें हैं | खैर जो भी हो राहुल को अब वोट लेने की तरकीब का पता चल गया है और वो इसपर पहल भी कर रहें हैं | राहुल अब समझ चुके हैं की अगर जनता के वोट को अपने पक्ष में करना है तो बयान भी समय को देखकर ही देना होगा |

Feb 7, 2010

क्या हो गया अमर के साथ ?

राजनीती ने कब कौन सी चीज़ महंगी पड़ जाती हैं ये किसी को पता नहीं रहता हैं | अब देख लीजिये जो अमर सिंह कल तक समाजवादी पार्टी के सबसे लोकप्रिय लोगों में से हुआ करते थे आज उस पार्टी ने उनको अपना रास्ता तलाश करने को कह दिया है |अमर को शायद पता नहीं था की उनकी इस नए दावं से मुलायम एक बार फिर पिघल कर उनको पार्टी में आने को कहेंगे | लेकिन अमर के तरह मुलायम ने भी यूटर्न ले लिया और उस काम को किया जो उन्हें बहुत ही पहले करना चाहिए था | अमर जनाब तो देश के अन्य राजनीतिक दलों की तरफ भी गए लेकिन सभी ने अमर को अपना दुखड़ा सुना दिया और अमर के लिए किसी भी जगह के लिए सॉरी कह दिया | अमर सिंह को कहाँ पता था की कल तक बड़े -बड़े नेताओ के लिए सीट और गद्दी पक्का करवाना किसी कम का नहीं रहता है अगर एक बार दिन ख़राब हो जाए | अमर ने मुलायम को एक जमीनी नेता से आसमानी नेता बना दिया पर यह भूल गए की जमीनी आखिर में जमीनी ही रहता है | कुछ दिनों के लिए वह जरूर हवा में रहता है लेकिन वापस एक न एक दिन उसे आना ही पड़ता है | अमर सिंह जी ने सोचा की इस बार मुलायम सिंह को कुछ इस प्रकार कमजोर कर दिया जाए की वो किसी काबिल न रहें | अमर ने मुलायम के घर को ही तोड़ने की कोशिश की जो सफल नहीं हो सका | अब अमर के साथ दिक्कत यह है की उनको सपा ने राज्यसभा से इस्तीफा देने को कहा है अमर भी इस्तीफा देने पे तुले थे लेकिन जब उन्होंने देखा की ऐसा करके वो किसी काम के नहीं रहेंगे तो उन्होंने अपना विचार बदल दिया | अब अमर को तो पता ही है की किसी भी काम को करवाने के लिए पद का होना कितना जरूरी होता है | लेकिन अब जैसे लगता है की अमर की राजनीत की गाड़ी पटरी पर से उतर रही है | अमर के साथ दिक्कत इस बात की भी है की उनका जनता के बीच कोई पकड़ नहीं है | अमर की सपा को बर्बाद करने की कोशिशो को अब विराम लगता हुआ दिखाई देता है | शायद अब अमर को भी समझ आ गया होगा की राजनीती में एक बयान का क्या महत्व होता है | अब लगता है की राजनीती में अमर कहीं सही में अब अमर ही न हो जाएँ |सपा में रह कर अमर ने राजनीत में जो नाम कमाया लगता है वह अब गुमनाम हो रह है | वैसे भी डूबते सूरज को कोई सलाम नहीं करता और अमर के राजनीती में अब सूरज थोडा बहुत डूब चूका है | इस बात को अमर भी जानते हैं और अभी इसको समझ भी रहे हैं |

Feb 5, 2010

सवाल जवाब बाल ठाकरे के साथ ?

आज कल  लगता है की लोगो को हमेशा सुर्ख़ियों में रहना ज्यादा अच्छा लगता हैं | अब जनाब बाला साहेब ठाकरे की ही पार्टी को लीजिये बात समझ में आ ही जायेगा | क्या तमाशा हो रहा है देश की आर्थिक राजधानी में यह हम सब तमाशाबीन की तरह देख रहें हैं | हम कर भी क्या सकते हैं मेरे दिमाग में एक बात कौंध रही है आखिर कारण  क्या है इसका ? इतना तो शोले का गब्बर भी जुल्म नहीं ढाता था ,मैं अपने लहजे में इसको बयां कर रहा हूँ  कुछ प्रश्न - उत्तर के तरीके से -:
प्रश्न - बाला साहेब आज कल आप लोग फ़िल्मी दुनिया पर लगें हुए हैं इसका कारण ?
बाला साहेब - देखिये आज कल हमारे पास कोई  मुद्दा है ही नहीं हम क्या कर सकते हैं | कुछ दिन पहले कहे की ऑस्ट्रेलिया अगर भारत आएगा खलने के लिए तो हम इसे सहन नहीं कर सकेंगे ,पर यह नारा हमारा फ्लॉप चला गया हम करें तो क्या करें ?किसी तरह तो अपनी जगह बनानी है |
प्रश्न -तो इसका मतलब हुआ की आप अपने को जनता में बनाने रखने के लिए ऐसा कर रहें हैं ?
ठाकरे - आप लोग तो सब जानते ही हैं क्या क्या नहीं करना पड़ता है अपनी साख बचने के लिए ?
प्रश्न - आजकल आपलोग शाहरुख़ खान के पीछे लगे हुए हैं क्या कारण है ?
ठाकरे - देखिये हम तो किसी मुद्दे की तलाश में थे तभी इस खान ने कुछ कह दिया ,हमें तो बैठे -बिठाये मुद्दा मिल गया तो हमने भी जोर पकड़ ली ? देखिये एक बात तो आपलोगों से छिपी नहीं ही है की फिर हम लोग एक ही है बॉलीवुड के लोग चुनाव के समय भी हमारा मदद करतें है और अगर वो कुछ कहतें है तो लोकप्रियता और भी बढती है | अब कुछ समझ में आया |
प्रश्न - अच्छा साहेब यह बताइए की आप लोगो ने कुछ दिन पहले लोकमत चैनल में घुस कर भी तोड़ फोड़ की थी ? इसकी क्या वजह थी ?
ठाकरे - आप तो जान  ही रहें है की हमारा जो भतीजा है राज ठाकरे
उसने हमारी नाक में दम कर दिया है | हमारा छत्र छाया में पला बढ़ा और आज हमें ही आँख दिखा रहा है | वैसे मुंबई के चुनावों में ख़राब प्रदर्शन के बाद हम और भी बौखलाए हुआ थे उस का ही नतीजा था यह हमला | 
प्रश्न - अच्छा आप यह बताएं की आपकी अगली रणनीति क्या है ?

ठाकरे - देखिये आगे महानगरपालिका का चुनाव आने वाले है |और आप तो जान ही रहें है की पालिका का बजट  कई हज़ार करोडो  के आस पास होता है हम उसको कैसे छोड़ दें | क्या हर तरफ से हम  निराशा ही मोल लें |
प्रश्न - आज बीजेपी भी आपसे गठबंधन के लिए सोच विचार कर रही है आप क्या मानते हैं ?
ठाकरे - देखिये ऐसी कोई बात नहीं है अरे आखिर हम दोनों तो एक ही चट्टे - बट्टे के लोग हैं | अरे कभी कभी तो ऐसी बात होती ही है | सुलह हो ही जाएगी |
प्रश्न - अच्छा साहब यह बतायिए की मुंबई  में जो आतंकवादी घटनाये हुई है इसका समाधान कैसे कर सकते हैं ?
उत्तर - अच्छा यह बात पूछ रहें हैं | बस हम लोगो के हाथ में सत्ता दे दीजिये फिर देखिये कैसे सारे समस्याओ का समाधान निकलता हैं |हम तो एक चुटकी देंगे और समस्या हल |
प्रश्न - आपका लक्ष्य क्या रहता है अपने विरुद्ध के लोगो के लिए ?
ठाकरे - अरे ज्यादा कुछ नहीं आप तो जानतें ही हैं की हमारी एक ही नीति है जो तुम्हारे लिए परेशानी पैदा करे उसको मुंह तोड़ जबाब दो और हम तो शुरू से ही ऐसा करते आयें हैं |आज भी वैसा ही करेंगे |
प्रश्न - अच्छा ठाकरे जी आप यह बतायिए की आपकी  उत्तर भारतियों को लेकर क्या राय हैं ?
उत्तर - सुनिए हमारी कोई स्पष्ट नीति अभी तक नहीं है हम तो सिर्फ एक ही नीति पर काम करें है | वो नीति हैं टाइम -टाइम पर देश के लोगो के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज करना |और इसी फेरें में कभी दक्षिण भारतीय तो कभी उत्तर भारतीय निशाना बनतें हैं | हम तो सिर्फ यही जानते हैं की हम देश स्तर पर तो अपनी पार्टी बना नहीं सकते हैं किसी तरह मुंबई पर ही राज कर लें |
प्रश्न - आप पाकिस्तानियो का विरोध करतें हैं लेकिन आप जावेद मियांदाद के साथ पूरे परिवार को लेकर हँसते हुए फोटो खिचवातें हैं , यह समझ में नहीं आया |
उत्तर - अरे जनाब आप मीडिया में कैसे आ गएँ ये मुझे अभी तक मालूम नहीं चल पा रहा है | अरे मियांदाद तो बड़े लोगो में से एक हैं हम तो ज्यादातर छोटे लोगो को अपना निशाना बनातें हैं |
प्रश्न - आपलोगों ने अभी कुछ बड़े लोगो पर भी निशाना साधा हैं ?
ठाकरे - आप देख नहीं पा रहें हैं हमने मुकेश अंबानी को लेकर ज्यादा हो हल्ला नहीं किया ,अगर हम ऐसे लोगो को निशाना बनायेंगे तो हमारा हुक्का -पानी कैसे चलेगा | हम भी सोच समझ कर कम करतें हैं |
प्रश्न - अभी हाल ही में खबर आयी है की आपका दुर्ग कमजोर होता जा रहा हैं ?
ठाकरे - हाँ खबर तो मैं भी सुन रहा हूँ |लेकिन आप देख ही रहें हैं की हम अपनी दुर्ग बचाने की पूरी कोशिश में लगे हुए हैं लेकिन समय ही साथ नहीं दे रहा है | वैसे भी मैं अब  थोडा कमजोर हो गया हूँ इसलिए कोई बात का ज्यादा असर नहीं पड़ता हैं आजकल |और राज भी अलग होकर टेंशन दे रहा हैं | अब तो राम ही मालिक | हिंदुत्व भी कारगर नहीं हो पा रहा हैं सूझ नहीं रहा है की क्या करूँ | अब तो आप लोगों का ही  भरोसा है की हमारी खबर लगातार मीडिया में छापें ताकि हम लोगों की नजरों में दिखाई देते रहें |
हमसे बातचीत करने के लिए ठाकरे साहेब आपका बहुत- बहुत शुक्रिया |
ठाकरे - हाँ आपको भी ताकी आप हमारे यह प्रश्न -उत्तर जल्दी दे छाप दें और हमें जिन्दा रखें |



Feb 4, 2010

आखिर यह देश किसका ?

आज सुबह से ही सोच रहा हूँ की आखिर यह देश किसका है ? कुछ बातें ऐसी होतीं हैं की सोचने पर मजबूर कर देती है मैं भी कुछ इसी प्रक्रिया से गुजर रहा हूँ |  मेरे दोस्त कहते हैं की मैं राजनीती की ही बात करता हूँ |आखिर आप ही बताएँ  बात भी क्या करूँ, देश में इसी शब्द की तो मांग है | मैं सोच रहा हूँ की क्या बताऊंगा जब कोई मुझसे यह पूछेगा की आप बतलायिए की यह देश वाजिब  में किसका है तो क्या कहूँगा मैं ? मैं पशोपेश में हूँ ,मैं सोचता हूँ की यह देश हर किसी का है | जब हमनें देस्व्ह की आजादी की खातिर लड़ाई लड़ी थी तब तो हमारा देश था भारत |लेकिन आज देश नहीं हमारा धर्म और राज्य ही सब कुछ हो गया है |किसी से पूछो की आप कहाँ से हैं तो वह कहेगा की मैं तो यूपी का हूँ मैं पंजाबी हूँ कोई शुरू में नहीं कहता की मैं भारत का हूँ ? आज देश की समस्या का यही कारण है |आज हमारे आपके जैसे लोग जो थोडा बहुत अपने को ज्ञानवान कहतें है अपने को छोड़कर दूसरे की बात शायद ही कभी करतें हैं | सिर्फ मैं खुश रहूँ  यही बात हर हमेशा आज हर कोई सोच रहा है
देश का चाहे जो भी हो उन्हें क्या मतलब उनको तो ठीक ठाक जीवन बिताने के लिए पैसा मिल ही जाता है ,दुसरे चिजों से क्या काम ?सच बात तो यह है की आज हम मतलबी और स्वार्थी हो गएँ हैं
दुसरे के सुख दुख मे कभी हम मिल्कर साझीदार होते थे पर आज हमारे बीच दुरियाँ हो गयीं हैं |
आज हम अपने पड़ोसियों को नहीं पह्चानते तक नहीं है क्या कारण है इसका ? लेकिन जब देश मे क्रेडिट लेने की बात आती है तो हम सबसे आगे रह्तें हैं| यही तो एक कारण है की आज हमारे देश मे इतनी गम्भीर समस्या उत्पन्न हो गई है| देश आज दो धुरियों में विभाजित हो रहा है लेकिन फिर भी किसी का सही से ध्यान इस ओर नहीं गया हैं |अब आप ही बताएँ की यह देश आखिर है किसका ?



Jan 26, 2010

ये टिकत नहीं आसान ?

राजनीती में  बड़े - बड़े लोगो के छक्के छूट जाते हैं| और जब समय चुनाव का हो तो पता चलता है की राजनीत है क्या ? सबसे दिक्कत वाला पल होता है जब टिकट मिलने का समय होता है ,यकीन नहीं होगा आपको की कैसे भाग दौड़ कर के नेता लोग अपनी सेहत बनाते हैं | जब तक टिकट नहीं मिलता है तो खूब प्रदेश की राजधानी से लेकर देश की राजधानी की यात्रा होती है | अगर इतनी सी दौड़ धूप के बाद भी टिकट मिलना पक्का हो तो कोई बात नहीं| सही बात है टिकट के लिए नेताओ को आजकल जितनी जिल्लत झेलनी पड़ रही हैं उतने में तो कोई आम आदमी चार धाम की यात्रा कर आवे | सबसे पहले समर्थक जुटाने पड़ते है इसके लिए देश के टॉप क्लास के मैनेजमेंट वाले लोगो से संपर्क करना होता है |यहाँ जानकारी जरूरी है की ये मैनेजमेंट वाले लोग आईआईएम या अन्य किसी बिजनेस संस्थान से नहीं बल्कि आम जनता से जुड़े हुए संस्थान से होते हैं |उसके बाद भीड़  मैनैजे करनी होती है जितनी ज्यादा भीड़ उतना ज्यादा चांस टिकट मिलने की |अगर लोग नहीं आये तो यकीन कौन  करेगा की फलाने नेता की फलाने जगह कुछ पकड़ है | खैर भीड़ जुटाने में नेताजी को शारीरिक और आर्थिक दोनों रूप से तैयार भी होना होता है |जब लोग नेताजी के रैली में आ गए तो नेता लोगो को कुछ यकीन होता है की इस बार टिकट मिल सकता है पूरा यकीन तो होता ही नहीं है |फिर शुरू होता है असली दौर बड़े -बड़े पार्टी पदाधिकारियों से मिलने का ताकि किसी तरह टिकट का जुगाड़ हो जाए |सिर्फ नेताजी ही नहीं कई चमचे भी चम्मच लगा रहे होते है नेताजी के टिकट के लिए | एक तरफ नेताजी लोगो से मिल कर यह आश्वासन भी ले रहे होते हैं की अगर पार्टी टिकट नहीं देती है तो वो निर्दलीय भी चुनाव लड़ सकते है | नेताजी मुलाकातों का दौर जारी रखते है इस दौरान ताकि कोई मौका छूट न जाए |फिर जब आखिरी दौर आता है एक- दो नामों के बीच कांटे का टक्कर होता है तो नेताजी लगातार बड़े नेताओ को अपनी ताकत का उद्धारण देने में कोई कसर नहीं छोड़ते | लेकिन जब टिकट मिलता है और सिर्फ एक को ही मिलता है तो बड़ी मायूसी होती है अन्य में |और जिसको टिकट मिल जाते है वो यह प्रचार करते फिर रहा होता है की किस तरह इतने लोगो को छांट कर उसे टिकट मिला है |सही में इसी समय नेता लोगो को लगता है की कितना मुश्किल होता है टिकर पाना | भगवान से ज्यादा वे अपने पार्टी के भगवानो को शुक्रिया देते हैं |

Jan 25, 2010

विज्ञापन में भूल ?

कल यानि की 24  जनवरी ,रोज की तरह सुबह बिस्तर से चिपका हुआ था तक़रीबन सुबह के 8  बज रहे होंगे |सर्दियों के सुबह में नॉएडा आने के बाद मैं इसी समय पर अक्सर अपनी आँख खोलता हूँ |कभी -कभी पहले भी खोल देता हूँ ,अनूप बाबु जो हमें सुबह- सुबह अखबार मुहैया करते हैं उनकी कृपा से |कल सोचा की चलो आज तो सन्डे है कुछ देर तलक सोते हैं ,लेकिन अनूप जी तो समय से ही आते हैं| मैं अभी जहाँ निवास करता हूँ वहां मेरा बसेरा तीसरे मंजिल पर है |अनूप जी तो इतने उपर आते नहीं है इसलिए दूसरे फ्लोर से ही पेपर फ़ेंक देते हैं |कल भी कुछ ऐसा ही किया उनने पेपर सीधा मेरे दरवाजे पर एक बम की आकर लगा मैं उठा और पेपर समेत कर रूम में वापस आ गया |अख़बार पढने की आदत तो आप सभी जानते ही होंगे कितनी बुरी होती है ,अगर अख़बार आ जाए तो मैं तो उसे बिना पढ़े रह ही नहीं पाता हूँ |मैंने शुरू कर दिया ,मैं फिलहाल तीन अख़बार लेता हूँ एक है अंग्रेजी का भारत का सबसे अधिक बिकने वाला the times of  india   तो और दो हैं नई दुनिया और दैनिक भास्कर |नई दुनिया को मैं पोलिटिकल न्यूज़ के लिए लेता हूँ |खैर अब आते है कुछ मुद्दे पर ,मैंने पेपर पढना शुरू किया ही था की तब तक मेरे मित्र और कमरे के सहयोगी वेद्पाणी जी की भी निद्रा भंग हो गयी |वेद्पाणी जी भी अखबार में रम  गए |मैं सबसे पहले अंग्रेजी वाला अखबार ही देखता हूँ मैं पढना इसलिए नहीं कहूँगा की मैं अखबार को पूरी तरह तो पढ़ ही नहीं सकता |खैर अखबार उलटते -उलटते हुए मेरी नजर एक विज्ञापन पर गयी जो भारत सरकार के महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा बालिका दिवस के उपलक्ष्य पर जारी की गयी थी |मुझे उसमे बहुत सा फोटो दिखा लेकिन एक ने मुझे गौर करने पर मजबूर कर दिया |मैंने गौर कर के देखा तो मुझे उसमे किसी दूसरे देश के सेना अधिकारी का फोटो लगा |मैंने उसे वहीं पर त्याग दिया और आगे दृष्टि दी |कुछ देर बाद एक प्रक्रिया के बाद वह अखबार वेद्पनी जी के पास गया |उनकी दृष्टि किसी भी चीज़ पर अगर टिक गयी तो उसका पूरा पड़ताल करके ही छोड़ते हैं |उन्होंने मुझे बुलाया और कहा की कश्यप जी देखिये यहाँ क्या है पाकिस्तान के अधिकारी का भारतीय विज्ञापन पर फोटो लगा है |मैंने कहा हाँ मुझे भी लगा कोई अलग देश का ही है फिर हम दोनों गौर कर के देखने लगे तो उन्होंने कहा की इसकी टोपी में चिन्ह देखिये पाकिस्तान का चाँद तारा निशान है |मैंने कहा हाँ इसका बैच भी अलग है |फिर हम दोनों में विमर्श होने लगा मैंने कहा लगता है इस विभाग को जानकारी का अभाव है |तरह तरह के बात निकले ,फिर समाप्त हो गयी |एक बात जो मैं सोच रहा था वह यह क्या की कैसे इतने बड़े जगह पर ऐसा मिस्टेक हो गया |आज मेरे पास वही दो हिंदी के और एक अंग्रेजी  के अखबार आये| हिंदी में तो मुख्य पृष्ठ की खबर थी कल वाले विज्ञापन की गलती ,पर जो अंग्रेजी  अखबार था उसमे अन्दर एक छोटी से खबर दी गयी थी |मुझे लगा इस अंग्रेजी के अखबार को क्या सिर्फ पैसो से मतलब है क्या वह कुछ देखता है भी की नहीं |मेरा विश्वास अब और तगड़ा हो गया था की इस अंग्रेजी के अखबार में कुछ भी दो अगर उससे पैसे आता है तो वह चाप जायेगा |किसी को भी इस घटना के लिए कम नहीं माना जाना चाहिए ,जो विज्ञापन दे रहा है और जहाँ छप रहा है दोनों जिम्मेदार हैं |इस अंग्रेजी अखबार में जो जो विज्ञापन थी उसमे जो पूर्व पाकिस्तानी वायुसेना प्रमुख तनवीर अहमद की तस्वीर छपी थी वह यह जाहिर करती है की हमारे देश की स्थिति क्या है ?इस जगह पर अगर कोई छोटा आदमी या छोटा संगठन ऐसी गलती करता तो हर कोई उसमे मीन मेख निकलता लेकिन यहाँ तो दोनो मे से एक भी नहीं है |ज्यादा कुछ होगा भी नहीं लेकिन मैं एक सलाह देन चाहूँगा अखबार वाले को की वो कम से कम एक बार विज्ञापन को जांच कर ले छापने से पहले ,अपने आप को आप देश के प्रहरी कहते हैं और ऐसी गलती करते हैं |अगर देश का प्रहरी ही सोते इन्सान की तरह काम करेगा तो देश के आम लोगो के विषय मे ऐसा सोच्न बेकार है की वो सही करेंगे |वैसे इस अंग्रेजी अखबार ने यह दिखा दिया है की उनके लिए पैसा ही सब कुछ है |और मैं मन्त्रालय मैं बैठे लोगो से भी एक बात कहना चाहूँगा की आप तो देश को चलने वाले लोग हो आप अगर ऐसी गलती करेंगे तो कैसे चलेगा देश ?काँग्रेस नीत इस सरकार के इस एक और गलती ने दिखा दिया है की सिर्फ सत्ता पाने से ही सारा काम नहीं होता है, उसको सही से चलाना भी जरूरी होता है |इस सरकार ने लगता है अभी तक सबक नहीं लिया है और करीब -करीब हर मन्त्रालय से लगातार इस प्रकार की गल्तियाँ हो रहिन है |कभी विदेश ,कभी शिक्षा ,कभी कृषि तो अब महिला और बाल विकास मन्त्रालय हर कोई लगातार गलती करता जा रहा हैं ,और देश इस हालात मे आ गया है |अब इनको कुछ ध्यान सही तरह से काम करने पर भी देना चाहिए |

Jan 22, 2010

किसी ने नहीं खरीदा पकिस्तानियो को ?

जैसा होना था वही हुआ पाकिस्तानी खिलाडियों को आइपीअल -3  में किसी भी टीम के प्रायोजकों ने नहीं ख़रीदा |खरीदने की बात तो तब न होती जब कोई इसके लिए बोली भी लगता ,यहाँ तो बोली भी नहीं लगी |काफी झमेले के बाद तो पाकिस्तानी खिलाडियों को बीड में शामिल किया गया लेकिन वो भी सिर्फ दिखावे के लिए |पाकिस्तानी खिलाडियों को थोड़ी बहुत आशा तो थी की उनको इस बार खेलने का मौका मिल सकता है ,लेकिन कहाँ बंधू ऐसा तो तब होता न जब उनको लेकर कोई गंभीर रहता |यहाँ तो सिर्फ दिकह्वे के लिए उनको निमंत्रण तो दे दिया गया पर भोज में शामिल होने का मौका ही नहीं दिया |पाकिस्तानी के बहुत से खिलाड़ी 20 -20  फॉर्मेट के बेहतरीन खिलाड़ी मने जाते हैं एक बार उनको इस आयोजन में भाग लेने का मौका मिला लेकिन फिर दरवाजे बंद हो गए |पाकिस्तान के द्वारा जो आतंकवादियो को लगातार प्रोत्साहन दिया जाता रहा है उसका असर पहले भी पाकिस्तान पर पड़ चूका है |लेकिन 26 /11  के बाद भारत में उनके देश के खिलाफ एक जो ज्वाला भड़की है उसने दोनों देशों के बीच संबंधो को और भी ख़राब कर दिया है |भारत पहली बार इतना खुल कर पकिस्तान का विरोध कर रहा है ,बात भी सही है एक तरफ आप हमें परेशान करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हो और दूसरी तरफ हमसे फायदे की उम्मीद भी रखते हो |भारत ने अब तक  कभी भी गलत का साथ नहीं दिया  है लेकिन पाकिस्तान इसको समझ ही नहीं सका है |अब जब भारत ने एक और कठोर कदम उठाया तो अब उनको समझ में आ रहा है |मेरे अनुसार देश सबसे पहले है और देश को अगर कोई अनदेखा करता है तो वह देश में रहने का हक़दार नहीं है |सब कुछ पैसा ही नहीं है इसका परिचय इस बार इस नीलामी में दिया गया |अब पाकिस्तान को लग रहा है की भारत ने यह कदम मुंबई हमलो के कारण उठाया है ,पाकिस्तान अगर भारत को इस मामले पर कुछ सहयोग देता तो सब कुछ ठीक हो सकता था लेकिन पाक तो आखिर पाकिस्तान है ,पीठ पैर छुरा घोपने वाला |मुझे लगता है अब भी शायद  पाकिस्तान को कुछ समझ आ जाए और वो भारत में होने वाली आतंकवादी गतिविधि का प्रायोजक न बने |अगर वो फिर से इस गतिविधि का प्रायोजक बनता है तो कहीं ऐसा न हो की उनके देश के खिलाडियों को भविष्य में कोई प्रायोजक ही न मिल सके |