Oct 11, 2010

बाबा क्या बोल गए ?

राहुल गाँधी आजकल युवाओं को राजनीती में आने की सलाह देते फिर रहे हैं| वैसे भी जब आदमी को बिना मेहनत का मुकाम हासिल हो जाते हैं तो उसके पास एक ही कम बचता है प्रवचन देना | खैर जो भी हो आप कहेंगे की प्रवचन तो साधू- महात्मा लोग भी देते हैं आप उनके बारे में कुछ क्यूँ नहीं कहते? खैर मेरी मनसा ऐसी कुछ नहीं है, मैं तो राजनीति के नए बाबा राहुल गाँधी की बात कर रहा हूँ | राहुल ने सीख लिया है की लोकप्रियता और जनता की नजरों में कैसे रहा जा सकता है | अभी राहुल को बिहार चुनाव में जाने की फुर्सत नहीं है लेकिन वह देश घुमने में मशगूल हैं | जो भी हो यह उनका मामला है | बिहार में तो युवाओं को पार्टी से जोड़ दिया, अपराधियों को भी बुला लिया, उत्तरप्रदेश में भी ऐसा ही कर रहे हैं | लोग कहते हैं की देश के अगले प्रधानमंत्री वही हैं , जरूर बने आखिर खानदानी जगह है, मम्मी सोनिया तो चूक गयी इनको नहीं चूकना है| ऐसी ही प्रणाली पे काम चाल रहा है| दौरे के इसी क्रम में बाबा मध्यप्रदेश भी आये | एक तरफ उनकी सरकार की राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर किरकिरी हो रही थी तो दूसरी तरफ बाबा देश भ्रमण पर थे, ऐसा होगा देश का प्रधानमंत्री तो क्या होगा देश का , जो जब देश पे लगातार ऊँगली उठ रही हो और वह बेफिक्र हो कर यायावरी करता फिर रहा हो| इसका तो यही मतलब हुआ की ' एक तरफ रोम जल रहा था, दूसरी तरफ नीरो बांसुरी बजा रहा था'| खैर देश के युवराज को जो एक वर्ग तक ही सीमित हैं को इन सब से कुछ लेना देना नहीं है | उनको तो चिंता है की किसी तरह युवा कांग्रेस आगे बढ़ता जाए | युवा कांग्रेस को ही मजबूत करने की खातिर बाबा 4 अक्टूबर को मध्यप्रदेश के तीन दिन के दौरे पे पधारे | युवाओं से बातचीत करी, राजनीति से जुड़ने के न्योता दिया , जैसे कोई बाप अपनी बेटी के शादी के पहले लोगों को देता है | सब कुछ ठीक ही चाल रहा था , लोग बाबा के दर्शन खातिर आ रहे थे , जब किसी को यह आभाष हो जाए की लोग उनके लिए आ रहे हैं तो वह यह तय नहीं कर पता है की क्या बोलें| आखिर किसी भी जुबान है , कभी भी फिसल सकती है | राहुल ने युवाओं से कहा की आपको राजनीत में कोई जगह देने वाला नहीं है , वहां आपको जगह खुद बनानी होगी | अगर देखें तो ठीक ही कह रहे थे राहुल वहां तो सिर्फ बड़े लोगों के सम्बन्धियों की जगह है , उसमे से अगर  बच जाए तो फिर आपका | राजस्थान, दिल्ली और हिमाचल के छात्र संघ चुनाव का दर्द राहुल में साफ़ नजर आ रहा  था, राहुल को जैसे ही आभाष हुआ की मध्यप्रदेश में भी छात्र संघ का चुनाव हो सकता है आने वाले दिनों में तो पहुँच गए यहाँ | खैर यहाँ भी अगर चुनाव हो जाए तो बाबा की किश्ती भंवर में फँस  सकती है| दूसरी बात बाबा ने कही की आपको बुजुर्ग नेताओं से मिलकर चलना होगा, हाँ लेकिन अगर वह यूथ कांग्रेस के चुनाव में किसी तरह का प्रभाव  डालने का प्रयास करें तो आप उनकी शिकायत करें | यह  जुमला नया आया आखिर हर बार एक ही जुमला कैसे कहें | काश यही बात बिहार , झारखण्ड और उत्तरप्रदेश में भी लागु हो पाती |वहां तो ऐसे लोग चुन कर आये हैं जिनकी दोस्ती बाहुबलियों से जगजाहिर है |  खैर राहुल को लगा की यहाँ के लोगों को इसके बारे में क्या पता? कह दो नई बात ? यहं भी चूक गए बाबा? शायद बाबा को पता चाल गया है  अल्पसंख्यकों को मिला कर रखना होगा , उनकी मीटिंग में पहली बार बाबा ने असलाम आलेकुम से शुरुआत की | खैर वोटरों को तो लुभाना ही होगा | इतना कुछ हो गया और देश में किसी को पता भी नहीं चला | अब जो बात बाबा ने कही वह उन्हें सुर्ख़ियों में लाने के लिए प्रयाप्त थी |  उन्होंने  संघ जैसे संगठन की तुलना राष्ट्रविरोधी सिमी से कर दी |  उन्होंने कहा की संघ और सिमी एक जैसे हैं , आगे कहा की आरएसएस व प्रतिबंधित सिमी दोनों ही हैं कट्टरपंथी विचारधारा के पोषक | यहाँ पे उनकी अज्ञानता साफ़ नजर आयी | शायद उनको इस महान देशसेवी संगठन के बारे में पता नहीं, शायद उन्होंने सोचा होगा उनको मुस्लिमों  का वोट बिहार में आसानी से मिल जायेगा, और वहां तो इस तरह के शब्द कह नहीं सकते तो यही कह लो | लेकिन इस मोर्चे पे भी बाबा की हवा निकल गयी | मैडम को भी चिंता होने लगी की क्या कह दिया बाबा ने | खैर जब छोटा बच्चा पैंट में पेशाब कर देता है तो माँ उसे साफ़ करती है | लेकिन जब बड़ा बच्चा ऐसा काम करे तो वह हंसी का पात्र बन जाता है | खैर राहुल के साथ भी यही हुआ| भोपाल में रविन्द्र भवन से दिया हुआ यह बयान राहुल के किसी काम नहीं आया, इसका दुःख उनको भी है | लेकिन राहुल को एक सलाह मैं भी देना चाहता  हूँ की एक तरफ तो आप जात और पात की राजनीति से उपर उठ कर बात करना चाहते हैं लेकिन दूसरी तरफ वोटों के लिए ऐसी घिनोनी हरकत करते हैं | खैर जो भी हो देश के लोगों से मेरी एक अपील है की ऐसा लोगों को पहले देश के बारे में बताएं फिर प्रधानमंत्री बनायें नहीं तो यह कुछ भी कर सकते हैं | कल को यह भी कह सकते हैं की भारत में ब्रिटिश शासन ही अच्छा है | मुझे एक बात और लगता है की राहुल को अब शादी कर लेनी चाहिए, ताकि उनका दिमाग नियंत्रित रहे | भोपाल जैसे खुबसूरत शहर को दुर्गंधित करने की कोशिश कभी नहीं चलेगी |

Sep 6, 2010

देश की शिक्षा कैसे सुधरेगी ?

आज एक दफा फिर से कुछ लिखने की कोशिश करने बैठा हूँ | हाथ कंप्यूटर के की बोर्ड पर चलने शुरू हो गएँ हैं तो लगता है थोड़ा बहुत लिख लूँगा | हाँ क्यूँ न लिखूंगा कोशिश करने वाले की कभी हार नहीं होती यह बात सबने सुन रखी है | मैंने भी कई बार इस शब्द को सुना है और आज उसी को लागु कर रहा हूँ | आज मैं सुबह से सोच रहा था की आज क्या लिखूंगा और मैंने अंतत काफी  जद्दोजहद के बाद फैसला किया की आज शिक्षा पर ही कुछ लिखूंगा , आखिर हाल में हमने शिक्षक दिवस भी मनाया है | तो इससे बेहतर तो कुछ हो ही नहीं सकता है | शिक्षक दिवस तो हर वर्ष मानते हैं हम ,लेकिन जो वायदे और घोषणाएं उस दिन की जाती है वो फिर अमल में आ नहीं पाती है| आज देश के शिक्षा मंत्री जो अपने को बहुत कुलीन समझते हैं , और समझे भी क्यूँ नहीं आखिर विदेशों में शिक्षा ग्रहण की , हमेशा से बड़े लोगों के उठना बैठना हुआ है , देश में शिक्षा की दशा को सुधारना चाह रहे हैं | लगातार नए-नए बिल संसद में सुधार को लेकर पेश किये जा रहे हैं , सहमती चाहे एक पे भी न बने आखिर पेश तो हो रहा है | विदेशी शिक्षण संस्थानों को भी निमंत्रण दिया जा रहा है , की आप आयें और देश में अपनी शाखा खोलें | वो शिक्षा के उच्च स्तर को लेकर काफी चिंतित दिख रहे हैं और खास कर के अंग्रेजी शिक्षा को लेकर वे काफी परेशान हैं | सही भी है आप ही सोचिये अगर आज के समय में अंग्रेजी न आती हो तो क्या होगा | अच्छे  माहौल में आप बैठने के काबिल नहीं रहेंगे , तथाकथित बड़े और सभ्य लोगों के नजरों में आपकी खातिरदारी नहीं होगी , और  आजकल ऐसा कौन नहीं चाहता है | तो अब तो आपको समझ आ ही गया होगा की शिक्षा मंत्री जी क्यूँ परेशान हैं | लेकिन एक बात जो पूरे मज़े को ख़राब कर रही है , शिक्षा मंत्री जिसको जानकर भी अनजान बने हुए हैं वो है भारत की असली शिक्षा की स्थिति | अब आईये हम इस हकीकत पर भी नज़र डालतें हैं | आज भी हमारे देश  कुल मिलाकर 12  लाख शिक्षकों की कमी है | आज भी 42  मिलियन बच्चे ( 1  मिलियन = 1000 ,000 )   जिनकी उम्र 6 से 14 वर्ष के बीच है स्कूलों से महरूम हैं | यह दिन पर दिन सुधर रहा है इसपर एक काली लेकिर ही छाई है | स्थिति तो और भी भयावह है आप ही बताईये आज भी देश के 16  प्रतिशत गांवों में प्रायमरी स्कूल की सुविधा नहीं है , और 17  प्रतिशत स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक है | अब बताईये क्या देश में शिक्षा की स्थिति अच्छी हो  रही है, उत्तर में मुझे नहीं लगता है की कोई कहेगा की सुधार आ रहा है | आज भी बिहार में प्रायमरी स्तर पर 1  लाख शिक्षकों की कमी है | झारखण्ड में 42 टीचरों के पद खाली हैं | और तो और उत्तरप्रदेश में तो 1000 प्रायमरी स्कूलों में तो शिक्षक ही नहीं हैं | और बिहार , झारखण्ड और राजस्थान में प्रत्येक प्रायमरी स्कूलों का औसत लें तो यह 2  शिक्षक प्रति स्कूल निकलेगा | देश में शिक्षा की ऐसी भयावह स्थित है और हमारे मंत्री महोदय विदेशी संस्थानों को आमंत्रण दे रहे हैं | सही ही कहते हैं की देश की शिक्षा की डोर उस आदमी के हाथ में देनी चाहिए जिसके देश के बारे में पता हो | ऐसे आदमी के हाथ में अगर व्यवस्था आएगी तो सुधार की संभावना रहेगी लेकिन अगर कपिल सिब्बल जैसे लोगों के हाथ में रही तो सुधार की संभावना बहुत कम है | स्थिति नीचे से लेकर ऊपर तक ऐसी ही है | क्या आपको नहीं लगता की हमारे देश में शिक्षा को सिर्फ ऐसे लोगों तक सीमित किया जा रहा है जो पहले से जागरूक हैं | अभी हाल में ही एक खबर आयी थी की एक लड़की जो इंजीनियरिंग की छात्रा थी ने सिर्फ इसलिए आत्महत्या कर ली की वो अंग्रेजी में कमजोर थी और इसके लिए क्लास में उसका मजाक बनाया जाता था | लेकिन इस और धयान देना जरूरी है जहाँ शुरू से ही पढाई नहीं हो पा रही है उनकी स्थिति कैसी होगी |  आज देश में शिक्षा के कानून के तहत शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच औसत 1 : 30  का होना चाहिए लेकिन यह औसत आज भी 1 : 42  का है और बिहार में तो यह 1 : 83  का है | आज हमारे देश में कई ऐसी स्कूली बच्चे हैं जिनको अंग्रेजी नहीं आती है , मैंने खुद इसका परीक्षण किया है | अंग्रेजी के नाम पे वो बिल्कुल शुन्य हो जाते हैं | और अगर हम पिछड़े इलाकों की बात करे तो स्थिति बहुत ही ख़राब है | हकीकत को नजरंदाज नहीं किया जा सकता , लेकिन हमारे देश में इसको नजरंदार किया जा रहा है | भविष्य के सपने देखने में कोई बुराई नहीं है , लेकिन उसके लिए काम भी करना होता है यह हमें नहीं भूलना चाहिए | स्थिति ऊपर से लेकर नीचे तक एक ही समान है , आज भी समय- समय पर आने वाली रिपोर्ट देश की शिक्षा की स्थिति से अवगत कराती है , और हमेशा खामी ही निकालती है | और इस रिपोर्ट को कुछ दिनों के बाद एक बक्से में बंद कर दिया जाता है और बक्से को  उफनती नदी में डाल दिया जाता  है | जिसका कोई ठिकाना नहीं रहता | यही स्थिति देश की है , आयोग बिठाया जाता है और उनसे रिपोर्ट मांगी जाती है ,लेकिन वह सिर्फ आयोग को ही पता रहता है की उसने रिपोर्ट क्या बनायीं है | तो यहाँ पर एक गंभीर प्रश्न उठता है की आखिर कैसे हमारे देश की स्थिति शिक्षा मामले में अच्छी होगी , क्या देश में जो स्थिति है शिक्षा की उसके आधार पर हम आगे सकते हैं | बात बिल्कुल  स्पष्ट है हमें यहाँ हकीकत को लेकर नीति बनानी होगी नहीं तो स्थिति ठीक नहीं हो सकता ? सुधार तो ऐसी स्थिति में हो ही नहीं सकता | एक सशक्त नीति बने होगी और उसके पालन करना होगा | और ऐसी नीति सिर्फ वातानुकूलित में बैठ कर नहीं बन सकता , इसके लिए हकीकत से रूबरू होना होगा , नहीं तो कुछ नहीं हो सकता |
  

Aug 30, 2010

ममता की मायागिरी ?

ममता बनर्जी को लेकर कांग्रेस के अगुवाई वाली सरकार को आये दिन विपक्ष के द्वारा तरह तरह की बाते सुननी पड़ती है | लेकिन सरकार ममता के छाँह में ही रहना चाहती है | और आये दिन ममता को लेकर कुछ भी कहने से डरती है | और एक ममता है जिसे किसी की परवाह नहीं है | उसे तो किसी भी तरह रायटर्स बिल्डिंग पर कब्ज़ा जमाना है | बंगाल उनकी प्राथमिकता है , देश को उनकी नजर में देखने वाले बहुत से लोग हैं | ममता का एक ही मिशन है 2011  में बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में सत्ता हासिल करना | और इसके लिए वो प्रयासरत भी हैं चलिए कुछ तो कर रही हैं वो | हमारे देश में तो ज्यादातर नेता लोग बीच में ही फंसे रहते हैं | ममता का विजन स्पष्ट है | ममता जब से रेलमंत्री बनी है तब से रेलवे का मुख्यालय बंगाल शिफ्ट हो गया है , आखिर जब शरद पवार ने भारतीय क्रिकेट का मुखिया बनते ही मुख्यालय मुंबई शिफ्ट करा दिया तो ममता क्यूँ न करे | लेकिन यहं ममता मात खा गयीं वो इसे पूरी तरह बंगाल भी शिफ्ट करना नहीं चाहती , सिर्फ काम काज के लिए अधिकारियों को दिल्ली तो कोलकाता के बीच दौड़ लगानी है | यह हुई न ममता की रंगबाजी | वो खुलेआम नक्सलियों  का समर्थन करती हैं लेकिन जब समय आता है तो अपने बात से मुकरने से भी नहीं हिचकती हैं | वैसे भी दिल्ली में ममता को क्या मिलेगा , बंगाल की वे मुखिया बन सकती हैं , सारे राज्य पे राज करेंगी | तो उनका हित को बंगाल में ही है | और जब दोनों तरफ काम हो ही रह है तो परेसानी की कोई बात ही नहीं है | रेल दुर्घटना हो तो सीधे कह दो की विरोधियों की चल है , यह तो कोई ममता से सीखे | इसमें कोई दो राय नहीं है की ममता का मिशन बंगाल बड़ी तेज गति से चल रहा है | केंद्र सरकार भी उनसे हार मान चूकी है , आखिर एक शेरनी जब खूंखार हो जाए तो कौन हार नहीं मानेगा| ममता एक बात बड़ी अच्छे से कहती है की उनकी चाहे लाख बुराइयाँ हो लेकिन वो अपने पथ से हटने वाली नहीं हैं | ममता का जो मिशन है उसकी झलक साफ़ दिखती है | सबसे ज्यादा रेलगाड़ी भी मिशन वाले जगह से गुजारनी चाहिए , आखिर हार रेलमंत्री तो ऐसा ही करता है तो ममता क्यूँ न करे | ममता एक बात बड़ी साफगोई से कहती है की मुझे बदनाम करने की चाहे कितनी भी कोशिश कर लो लेकिन मैं अपने रास्ते से हिलने वाली नहीं हूँ | मिशन तो मैं किसी भी हद पर पूरा करके रहूंगी |

सेक्स और समाज ?

आज लिखने तो बैठ गया हूँ, पर अपने को यह समझा नहीं पा रहा हूँ की आखिर आज का विषय क्या होगा ? कुछ सोचने की कोशिश करता हूँ तो लगता है अरे मेरे पास तो ढ़ेरों विषय हैं | ज्यादा सोचना नहीं है , बस अब माउस हाथ में आ गया है और कीबोर्ड भी कह रहा है की कुछ लिख ही दो भाई, ज्यादा सोचो विचारो नहीं ? मैं भी आखिर में इनकी ही बात मान रहा हूँ और फिर से कुछ लिखने को प्रतिबद्ध हो रहा हूँ ? पर कहा जाता हैं न डीजल इंजन को गर्माने में थोड़ा समय लगता है तो वही मुझे भी लग रहा है | रोज की तरह  राजनीत और अर्थनीत पर लिखने से आज मैं परहेज करने के मूड में हूँ | आज मैं सेक्स पर कुछ लिखने जा रहा हूँ | सही में देखें तो अभी भी हमारे समाज में यह एक विचाराधीन मुद्दा ही है | लोग अभी भी इसके बारे में खुल कर बात नहीं करते हैं , आखिर करें भी तो कैसे अपने को सभ्य जो कहते हैं | इस तरह की बातों से उनकी असलियत बाहर आने का जो डर लगा रहता है | पर जहाँ तक मेरा मानना है आज जितना लोग कहते फिर रहे हैं की यह बड़ा ही ख़राब मुद्दा है उतनी तेजी से ही यह बढ़ता जा रहा है | पहले अक्सर देखा जाता था की लोग शादी के बाद ही रतिक्रिया में भाग लेते थे | एक दो प्रतिशत ही इसके अपवाद थे | फिर यह कॉलेज तक आ पहुंचा | अब कॉलेज के विद्यार्थी इसमें भाग लेने लगे | समय बड़ी तेजी से घुमा और हायर सेकेन्ड्री स्तर के स्टुडेंट इसमें शरीक होने लगे | पर कहते हैं न तकनीक ने सबको पीछे छोड़ दिया है आज तो क्या बताएं बच्चे-बच्चे इसमें मशगुल हैं | तो कहिये क्या यह छुपाने की बात है | अब इसका दूसरा पहलु लोग कहते हैं की आदमी एक उम्र के बाद सेक्स की गतिविधि से दूर हो जाता है लेकिन मैं इस मान्यता के बिल्कुल खिलाफ हूँ | अरे साहेब मैंने खुद देखा है की ऐसी उम्र में लोग और रसिक हो जाते हैं | वो ऐसा खुलेआम करते हैं , क्यूंकि उनको तो इस चीज़ की फ़िक्र रहती ही नहीं है की उनपर भी कोई शक करेगा | तो बतायिया जब बच्चे और बूढ़े दोनों इस कम में पीछे नहीं हैं तो फिर इस तरह की बात छिपाना किससे| एक वाक्य लिखने की चाहत है और लिख ही देता हूँ | मैं बिहार का रहने वाला हूँ | हमारे यहाँ एक ठाकुर बाबा हैं | समाज में उनकी बड़ी ही इज्जत है , धार्मिक कार्यों में सबसे आगे रहते हैं | लेकिन उनकी एक दूसरी स्थिति भी है , वो बड़े ही सेक्सी विचारधारा के भी हैं | एक बार उन्होंने मुझे और मेरे दोस्तों को एक लड़की की ओर  इशारा करके कहा का देखते क्या हो ??????????????? अब आप समझ ही गए होंगे क्या बात कहना चाह रहे थे वो | एक दिन मुझसे मिले जब मैं दिल्ल्ली से घर आया था तो कहा क्या बेटा वहां कुछ हुआ की सब जगह मरुस्थल ही है | और तो और उन्होंने मुझसे यह भी मांग कर डाली की मुझे ब्लू फिल्म दिखाओ |  अब आप ही बताओ क्या है ? यह दबी कुची भावना है लेकिन सिर्फ डर से बाहर नहीं आती है | आज भी जब कोई जवान लड़की सड़क पे मटक कर चलती है तो देखने वाले सबसे पहले उसे सेक्स की दृष्टी से ही देखते हैं | कहना होता है उनका मस्त माल है , मज़ा आ जायेगा | आप ही बताओ क्या ऐसा सही में नहीं होता है | मैं ज्यादातर की बात करता हूँ | मैंने कई लोगों को देखा है जो दिन में तो इसके विरुद्ध आन्दोलन निकालते रहते हैं , समाज सुधार के प्रणेता बनने का ढोंग रचते हैं ,लेकिन रात के अँधेरे में वही हरकत कर बैठते हैं | दुनिया के बहुत से देशों में सेक्स की शिक्षा दी जाती है और वह ठीक है | वैसे भी लोग जानकारी ले ही रहे हैं तो खुलेआम लेने में क्या हर्ज़ है | मैं बतौब एक बार हमलोग सर्वे का रिजल्ट देख रहे थे , उस रिजल्ट में था की प्रत्येक 4  में से 1 16  वर्ष की उम्र होते होते अपनी कौमार्यता खो चूका था चाहे वो लड़का हो या लड़की | ताज्जुब हुआ पर वो हमारे राष्ट्रीय राजधानी की स्थिति थी | अब बतायिया ? मैं पिछले बार घर गया था तो पता चला की मेरा एक पडोसी जिसकी उम्र मुश्किल से 14 -15 वर्ष रही होगी एक लड़की को लेकर फरार हो गया | आप ही कहो न यह क्या है ? तो मैं यहाँ पर यही कहने की कोशिश कर रहा हूँ की इस चीज़ को हमर समाज में जीतन छुपाया जा रहा है उसका कोई सार्थक परिणाम नहीं आ रहा है | आज छोटे- छोटे बच्चे जब हम उस उम्र के थे तो इस चीज़ के बारे में अनजान थे लेकिन आज हामी से पूछते हैं की क्या भैया लड़की-वडकी पटाई की नहीं | कुछ हुआ की नहीं , मैं तो इतना काम कर चुका हूँ |
थोड़ा आश्चर्य होता है लेकिन फिर समझ जाता हूँ | आज इन्टनेट के पोर्न साईट के बारे में सबको पता है | अकेला मौका देखा नही की लग गए , घर मैं माँ- बाप नहीं हैं तो बाजार से पोर्न कैसेट लाकर ब्लू फिल्म देखने लगे | यह सिर्फ लड़के ही नहीं लड़कियां भी करती हैं | तो बताओ क्या सेक्स की बात करनी गलत है , क्या है समाज को बर्बाद कर देगा | आपका जवाब इसकी पुष्टि कर सकता है |

Aug 23, 2010

आन्दोलन ही एक चारा ?

देश में अराजकता तो माहौल तो पहले भी रहा है, लेकिन अब जो बन रहा है वो कहीं ज्यादा विषम है|
आये दिन चर्चा होती रहती है इसको दूर करने को लेकर, लेकिन वो सिर्फ बैठक तक ही सीमित रह जाती है
जो चीज़ वातुनुकुलित कमरों में तय होता उसे बाहर निकला ही नहीं जाता है, बाहर निकलने की कोशिश भी नहीं की जाती है| ऐसी ही अराजकता और स्थिति विद्रोह को निमंत्रण देती है विद्रोह का मतलब जब आम जनता शासन और व्यवस्था से तंग आ जाता है तो उसके पास एक ही रास्ता होता है और वो है प्रदर्शन और कथित नेतृत्व के विरोध में संगठित होकर जबाब देना| इतिहास गवाह है जब जब अति हुई है तब तब जनता ने इसको बचाने की भरपूर कोशिश की है और अपने ताकत का एहसास कराया है| समय और परिस्थिति हमेशा से आम को आवाम को रास्ता दिखाने को मजबूर करती करती है| सन 1975 में भी ऐसा ही हुआ था जब इंदिरा गाँधी के विरुद्ध आम की आवाज़ बुलंद हुई थी| जयप्रकाश नारायण ने मोर्चा खोला तो लोग अपनी दबी भावना को छिपा न सके और आ गए सड़कों पर, दिखा दी अपनी ताकत और परिणामस्वरूप इंदिरा गाँधी को सत्ता से दूर जाना पड़ा था, जाना क्या पड़ा था दूर कर दिया गया था| स्थिति को इंदिरा ने अच्छी तरह समझ लिया की हमेशा अपनी मन मुताबिक काम नहीं कभी आम लोगों के लिए भी काम करनी होती है |आज उस चीज़ को बीते लगभग 35 वर्ष हो गएँ है|
उस समय के कितने लोग भगवान को प्यारे हो गए, तो कितने सत्ता का सुख ले रहे हैं लेकिन आज फिर उसी देश में स्थिति कुछ वैसी ही बनती दिख रही है| आज देश में हर तरफ एक अजीब सा माहौल है सरकार और शासन विवश दिख रहा है| आम के अन्दर एक अजीब सा आक्रोश पैदा हो रहा है| आज देश में गरीबी, भुखमरी, अनियंत्रित व्यवस्था आम हो गयी है| एक तरफ लोग दिन प्रतिदिन आमिर होते जा रहे हैं तो दूसरी और गरीबी भी सुरषा के मुंह की तरह फैलती जा रही है, और पता नहीं कितना फैलेगी| एक तरफ अनाज बर्बाद हो रहा है, दूसरी तरफ लोग दाने-दाने को मोहताज़ हैं|एक तरफ हम विश्व मंच से अपने विकसित होने की बात करते फिर रहे हैं तो दूसरी और लोग एक दूसरे को देख कर आंहे भरते नजर आ रहे हैं| इस देश का ही एक भाग लगातार बेवजह सुलग रहा है और सरकार सिर्फ दिलासा देती फिर रही है| सरकार को लगातार आंतरिक ताकतों द्वारा चुनौती मिल रही है और सरकार सिर्फ घोषणा और बयान देकर अपना काम पूरा कर रही है| आज बेरोजगारी की स्थिति और भी भयावह होती जा रही है ,लेकिन यहाँ भी सिर्फ आश्वाशन ही मिलता दिख रहा है| अब जो सबसे बड़ी बात है वो यह क्या की इतना कुछ होने के बाद भी हम चुप क्यूँ हैं| तो इसका सीधा सा एक ही जवाब है की कोई आगे आने की हिम्मत नहीं कर रहा है| एक बात तो तय है की कोई न कोई तो आगे आएगा ही| लेकिन सबसे बड़ी बात जो है वो ये क्या की आज का युवा वर्ग सिर्फ अपने तक ही सीमित होकर रह गया है| उसे देश दुनिया से ज्यादा कुछ लेना देना नहीं रह गया है|यह स्थिति देश के लिए खतरनाक है| हाल में मैंने अपने तीन चार मित्रों से कहा की हमलोगों को देश के लिए कुछ करना चाहिए तो वो सोचने वाली स्थिति में आ गए| और सबसे जो सबसे बड़ी बात है वो ये क्या की उनमे से ज्यादातर ने कहा क इतुम तो राजनीती के कीड़े हो तो बनो , हमलोगों के भी कुछ कल्याण कर देना
मुझे बड़ा ही ताज्जुब हुआ , और खुद पर शर्म भी आयी की पढ़े लिखे लोग ऐसा सोच सकते हैं तो औरों की तो बात ही कुछ और है| लेकिन मेरा भरोसा है की एक दिन वही लोग आयेंगे और कहेंगे की हम भी कुछ करना चाहते हैं| मेरी शिकायत है की आखिर क्या हम इतने बेफिक्र हो गए हैं की अपने में ही चूर रहते हैं
दुःख तो होता ही है लेकिन  नेक पल यह भी सोचता हूँ की सही ही तो कर रहे हैं|
लेकिन दूसरे पल गुस्सा भी आता है जब वो कहते हैं की राजनीत देश को बर्बाद करके ही दम लेगी|
अरे भाई जब आप गली देते हो तो उसे सुधारने की कोशिश तो करो , वो आपसे होगा नहीं तो आप लाया खी नहीं हो उस विषय में कुछ कहने को| मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ की आज जो स्थिति बन रही है वो आज न कल एक आन्दोलन का रूप लेने वाली है| जनता का खून कभी तो गरम होगा , लोग कभी तो कुछ देश के बारे में सोचेंगे और युवा वर्ग कभी तो अपने अधिकार के लिए आगे आएगा| सब परिस्थिति  पनप  रही है बस अब चिंगारी फूटनी बांकी है| आग तो कब  की लग चूकी है और बहुत से लोग ऐसा हैं जो झुलसने वाले हैं|
अब फिर से एक आपातकाल की जरूरत भी आ सकती है जब देश के लोग एकजुट हों और एक करार जवाब दें
युवाओं से बस एक ही बात कहना चाहता हूँ की देश के लिए भी कुछ समय वह दे |
अगर आप देश और समाज को नहीं देखेंगे तो क्या फिरंगी लोग देखेंगे|
एक तरह से तो यही मनसा पैदा कर रहे है आपलोग समय रहते अगर कुछ नहीं किया गया तो हो सकता है की फिरंगी फिर से लौट आयें| इसलिए अब युवाओं को इस व्याप्त अवयवस्था के खिलाफ आवाज़ उठानी होगी
मैं दावे और यकीन के सात कह सकता हूँ की अगर एक बार देश में आवाज़ बुलंद हो गयी तो सरकार भी निंद्रा से जग जाएगी|
आखिर क्या कहना है आपका देश को लेकर, क्या विचार रखते है जरूर अवगत कराएँ|

Aug 14, 2010

किस कारण बदल गई छात्र राजनीत ?

बात हो रही है छात्र राजनीत की | विषय बड़ा गंभीर है, बात भी गंभीरता वाली होनी चाहिए| यह एक ऐसा विषय है जो देश की दशा और दिशा दोनों बड़ा सकता है | आज देश में हर जगह एक अजीब सी स्थिति हो गयी है | और जहाँ तक बात है छात्र राजनीती का तो इसमें बदलाव जरूर आया है | धनबल तो खैर तुक्छ चीज़ हो जाती है यहाँ बाहुबल भी छोटा पड़ जाता है, और इन सबके उपर हावी हो जाता है वह है इसके साथ भी राजनीती | अगर राजनीत हो और वह सही दिशा में चले तो देश और समाज का हित हो सकता है लेकिन वही जब पथ से भटक जाए तो अहित होने से कोई रोक नहीं सकता | और आज ऐसा ही कुछ हो रहा है | आज अगर देखा जाए तो देश में एक अच्छे छात्र नेता की कमी सी लगती है, लगता है समाज में कोई है ही नहीं | और जो महानगरों में कुछ हैं भी तो उनसे आम लोग जुड़ नहीं पाते हैं | मतलब स्पष्ट है समस्या बरकरार है | जहाँ तक बात है डूसू चुनाव की यहाँ लोग चुनाव तो जीत जाते हैं लेकिन आगे सफलता की बात कम ही रह पाती है | स्पष्ट है यहाँ के चुनाव में एक खास जात और गुट का ही दबदबा रह रहा है पिछले कुछ चुनावों से | जमकर माहौल बनाया जाता है | लेकिन यह सब यहीं तक सिमट कर रह जाता है | देश को इनसे कोई लेना देना नहीं रहता | आप ही देखिये की कितने नेतओं ने बड़ा धमाल किया है | वो दिल्ली में बैठ कर राजनीत को चलाने की बात जरूर करते हैं लेकिन ज्यादातर मोर्चे पर विफल ही हैं | और एक बात तय है की आज भी चाहे जो दावा और बात की जाए लेकिन यहाँ के कम ही लोग चुनाव को देश से जोड़कर देखतें हैं, निजी हित सर्वोपरी होता है | आज देश को एक अदद जयप्रकाश नारायण जैसे लीडर की जरूरत है | लेकिन जो अभाव है वो स्पष्ट देखा जा सकता है | अगर सही मायनों में कोई अच्छा छात्र दिल्ल्ली में छात्र नेता रहता, जिसकी रूचि गावं और शहर दोनों में रहती तो जेपी की तरह जनता और लोग उनसे जुड़ते | लेकिन एक शुन्यता है जो निकट भविष्य में पूरा होते नहीं दिखता | अब राजनीत में आखाड़े का प्रवेश हो गया है , जहाँ लोग पथ्कानी तो दे सकते हैं लेकिन किसी का दर्द नहीं समझ सकते | भविष्य की जो बात करता है वह ज्यादातर डरा हुआ इंसान होता है | जहाँ तक बात छात्र राजनीती के भाविस्ये की है तो एक बात नज़र आती है की जब तक सही में एक क्रांति नहीं होगी लोगों में विश्वास नहीं आएगा | सही में देखें तो एक क्रांति की सख्त जरूरत है जो देश को नया जीवन दे सके | और अगर एक सही छात्र जीत कर आता है जिसने गरीबों, बेकसूरों की सच्ची दुनिया देखी है तो तो इससे देह का कल्याण हो सकता है | जहाँ तक इसमें कम होते रुझान की बात है तो कोई गलत बात नहीं है | सही में छात्रों का इससे लगाव कम हो रहा है | वो अपने को इससे जुड़ा हुआ महसूस नहीं कर पा रहें है | जो सबसे बड़ी बाधा है | सही मायनों में इसका दमन कोई और नहीं बल्कि छात्र ही कर रहे हैं |

Aug 8, 2010

क्रांति की ओर इशारा ?

आज फिर कुछ लिखने की कोशिश करने की जहमत उठा रहा हूँ | इस बार विषय थोड़ा गंभीर है देखता हूँ कितना न्याय कर पाता हूँ | आज तस्वीर के माध्यम से कुछ कहना चाह रहा हूँ | यह तस्वीर हमारे अपने देश भारत की है जिसे हम जी जान से भी ज्यादा प्यार करने की बात करते हैं | हम सिर्फ बात ही करतें हैं लेकिन अगर यह देश हमारा है तो फिर यहाँ के लोग हमारे क्यूँ नहीं हैं ? यह एक कठोर लेकिन सत्य प्रश्न है, जिसे हम चाह कर भी नकार नहीं सकते | आज देश में एक तरफ बाढ़ से तभी है तो दूसरी तरफ स्थिति भूखों मरने की है | उत्तर भारत के कई राज्यों में सुखाड़ की स्थिति बनी हुई है | कई जिले सुखा ग्रस्त घोषित हो चूके हैं| कीमतें तो आसमान छु ही रही है | सरकार बेबस ओर अपंग की तरह पेश आ रही है | सबसे बड़ी जो कठिनाई है वो यह क्या अगर वर्षा नहीं हुई तो क्या होगा गरीब किसानों का जो इसके सहारे ही टिके हुए है | आत्महत्या जारी है रोज़ किसान इस तरह की घटनाओं  को  अंजाम दे रहे हैं | यह भयावह स्थिति हर साल आती है लेकिन शायद वातानुकूलित कमरे में बैठ कर देश चलाने वालों को इसकी खबर नहीं है | अभी भी ये चिरनिंद्रा में है , इनकी माने तो देश तो निवेश से चलता है | किसानों के भरोसे देश थोड़े ही चलता है | यह
दूसरी तस्वीर ओर भी भयावह है ये इस आस में हैं की कब उपर वाले की कृपा हो ओर हमारी रोजी रोटी का इंतजाम हो सके |

चाहे जो भी हो लेकिन यह एक ऐसा सुच है जिससे हम इनकार नहीं कर सकते | कही ऐसे न हो की एक ऐसी क्रांति इस रूप में शुरू हो जाए जिसका फिर कोई निदान न हो सके | बारिश की आश में कई लोग जान दे देते हैं तो किसी की ले भी सकते हैं | यह एक क्रांति की ओर बढ़ रहा है जो भूख ओर खाने को लेकर होगी | अगर अभी भी सही इंतजाम नहीं हुआ तो यह नजदीक है | इस बार जब भूखे लोग सडको पर निकलेंगे तो फिर इससे रोक पाना असंभव ही होगा | देश को इससे बचाने के प्रयत्न अभी से शुरू नहीं किया गया तो भविष्य बहुत कठिन साबित होने वाला है |