Apr 29, 2013

चालू हो गया राजनीतिक तमाशा

मौसम गर्मी का है, धूप काफी तेज है। सूरज की प्रचंडता में बदन जला जा रहा है। देश का मिजाज भी गर्म ही है। जब हर तरफ गरमी का एहसास है तो राजनीति कैसे अछूती रहेगी। जनाब राजनीति भी काफी गरम है। इस गरमी का नजारा संसद में देखने को खूब मिल रहा है। लगातार आरोप-प्रत्यारोप का दौर चालू है। अगर गौर करें तो मिशन 2 0 1 4 की तैयारी जोरों पर है। हर दल ख्वाबों में अपने को सत्ता के करीब देख रही है। बड़ी पार्टियों के साथ छोटी पार्टियों को भी लग रहा है की इस बार बिना उनके सहयोग के कोई भी राजा नहीं बन सकता। बिहार, बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु, यूपी  के छत्रप तो मंद-मंद मुस्कुरा रहें हैं की चाहे जो जितना भी गरजे बर्षा तो उनके सहयोग से ही होगी। कोई कोलगेट पे कलह कर रहा है तो कोई कॉमनवेल्थ के सहारे वेल्थ बनाने की जुगत में है। कोई तीर को कमान में लाने को प्रयासरत है तो कोई हाथी मेरे साथी का जुमला उछाल रहा है। कोई अम्मा तो कोई दीदी को मना रहा है तो कोई साइकिल की रफ़्तार के साथ जाने की सोच रहा है। एक तरफ कमल अपना कुनबा बढ़ाने की जद्दोजहद कर रहा है तो एक तरफ हाथ सबके साथ वाली बात करने में व्यस्त है। कहीं बाबा की ब्रांडिंग हो रही है तो कहीं नमो मंत्र का जाप हो रहा है। कोई साधु संतो के शरण में जा रहा है तो कोई युवाओं को साथ लेकर चलने की बात कर रहा है। कोई लैपटॉप तो कोई घर देने की बात कर रहा है। कोई पिछड़े तो कोई अगड़े की रहनुमाई कर रहा है तो कोई माइनॉरिटी संग मोहब्बत बढ़ा रहा है। लेकिन इतना सब होते हुए भी आम आदमी बिल्कुल गायब है। उसको टॉर्च लेकर ढूंढा जा रहा है। तमाशा तो चालू हो चूका है, तमाशबीन पूरे लाव लश्कर के साथ डट चूके हैं तो चलिए हम भी चलें तमाशा देखने।  साथ में कुछ पैसे-वैसे भी लेना मत भूलिएगा कुछ खा-पीकर वापस आएंगे ऐसे थोड़े ही।

Apr 16, 2013

सुशासन बाबू को भगवा का भय?

फिलहाल गर्मियों का मौसम चल रहा है तो जाहिर सी बात है वातावरण तो गर्म होगा ही। मीडिया में भी गर्मी है रोज-रोज बिना मेहनत के मजेदार खबर मिल जा रही है। आने वाला वर्ष चुनाव का वर्ष है तो राजनीतिक गर्मी भी बढ़े तो हमें ताज्जुब नहीं होनी चाहिए। अब देखिए न बिहार का भी वातावरण गर्म हो रहा है जो दिल्ली तक को गरमा रहा है। बोलते हैं नीतीश तो हिलते हैं कई सारे। वैसे भी नीतीश जी को आजकल कुछ ज्यादा ही गर्मी चढ़ी हुई है, लो क्या बकबास बात कर दी मैंने। आखिर लगातार दूसरी बार पाटलिपुत्र की गद्दी मिली है तो सम्राट क्या ठंडा रहेगा। कोई भी आराम से कह सकता है की गद्दी की गरमी बर्दाश्त करनी बहुत मुश्किल होती है। अपने चारा वाले साहेब खूब जानते हैं, क्या मजेदार तरीके से तम्बाकू खाते गरमी झाड़ते थे। आजकल लालटेन किसी तरह एक बार फिर जले इसके लिए तेल का इंतजाम करते फिर रहे हैं। जाने दीजिए जो हुआ सो हुआ अब आते हैं सुशासन बाबू पे। आजकल सुशासन बाबू पूरे गरम हैं बेल का शर्बत और आम की चटनी भी बेअसर है उनके गरमी पर। अपने चचेरे भाई (राजनीतिक) पर रोज -रोज पिनक रहे हैं। अरे भाई ने कह क्या दिया की सिर्फ सुशील ही नहीं अबकी असली मोदी को भी जगह देना होगा। बाप रे बाप एक तो करेला दूजा नीम चढ़ा। आखिर हो बर्दाश्त उनके चलते ही तो सुशासन बाबू की राजनीत अभी तक बची हुई है नहीं तो मुद्दा तो है ही कहाँ। और लालटेन भी टोपी पर दम लगा दिया है तो कुछ तो करना होगा। भूरा बाल तो साथ नहीं ही देगा कम से कम टोपी वाला तो न बिदके। गरमी में बड़ा राहत होता है टोपी से। सुशासन बाबू सोचे की भगवा झंडा को भपकी देंगे तो वह शांत हो जाएगा। सुशील तो वैसे भी सुशील हैं, लेकिन मामला उल्टा पड़ गया। भगवा रंग इस बार पूरा रंगा रहा एक रंग में और सुशासन बाबू को खूब खरी-खोटी सुननी पड़ी। कभी पाटलिपुत्र वाले ने गुस्सा दिखाया तो कभी हस्तिनापुर वाले ने। नतीजा सुशासन बाबू शांति की और जाने लगे। और तो और जब सुशील ने भी अपना रूप दिखाया तो बाबू को लगा की अब तो बिभीषण भी ललकारने लगा। क्या करें, क्या ना करें चलो किसी संघी को ही मलहम लगाया जाए। आखिर बात बनाने में ही फायदा है। सारा भपकी गीदड़ वाला बन गया। पार्टी में तो शरद भी हैं जो गरमी में भी जमे रहना ही पसंद करते हैं। लेकिन इस बार कुछ गरमी उनको भी लगी लेकिन शांत रहना जैसे उनका परम स्वभाव है सो वो उसी पे चलते हैं। सुशासन बाबू ने त्याग-तपस्या वाले को भी मोर्चा पर लगाया लेकिन बात नहीं बनी। अंत में बाबा के शरण में गए लेकिन वो भी जानते हैं भगवा में बाबाओं की कोई कमी नहीं है। वैसे भी मामला तो हम जैसे लोग ही तय करेंगे लेकिन समय-काल और वर्तमान परिस्थिति में सुशासन बाबू जीत से दूर रह गए। और तो और भगवा वाले अब सोच रहें हैं की जब सुशासन की वाहवाही सुशासन बाबू लूटें तो कुशासन का इल्जाम हम क्यूँ सहें। और इन सारी बातों को सोचकर वह भी मन बना रहें हैं की पाटलिपुत्र की सत्ता के अन्दर रह कर बदनामी मोल क्यूँ लिया जाये तो बाहर रह कर भी थोड़ा तमाशा देखा जाए। चलिए अब थोड़ा दरबार घूम लिया जाए कुछ राजकाज की उलटी-सीधी बात जान ली जाए। क्यूँ सही कहा न चलिए देखें क्या हो रहा है?






















Mar 10, 2013

नीतीश का नया पैंतरा?


आगामी 17 मार्च को बिहार की सत्तासीन पार्टी जनता दल यूनाइटेड दिल्ली में राजनीतिक रैली कर रही है। रैली पार्टी अपने लिए बचे आखिरी मुद्दे बिहार को विशेष राज्य का दर्जा को लेकर कर रही है। खूब उगाही जारी है, पार्टी अपने सभी स्टार नेताओं को इस मोर्चे पर लगा चुकी है। बिहार में तो पार्टी ने खूब कमाया अब बारी दिल्ली की है तो मेहनत तो बनती है न। इधर पार्टी की सत्ता सहयोगी बीजेपी ने भी ठान लिया है की मोदी को पीएम पद का प्रत्याशी बनाना ही है। अरे भैया सुशासन बाबू तो दिखावे के लिए मोदी का खूब विरोध करते रहे हैं जबकि हकीकत तो यह है की मोदी ही नीतीश के सबसे बड़े तारणहार हैं। आखिर चुनाव में एक मुद्दा तो बन ही जाते हैं मोदी। लेकिन इस बार बात कुछ उल्टी पड़ गयी है। सुशासन बाबू  का शासन जनता को खुश नहीं रख पा रहा है। अब बात है की आखिर बिहार में ऐसी नौबत कैसे आ गयी जो लोगों का सरकार से भरोसा उठते जा रहा है। भले ही नीतीश के चम्मच गला फाड़ के कहें की विपक्ष एक साजिश कर रहा है लेकिन सही बात यह है की नीतीश गर्त में जा रहे हैं। लोगों ने एक भरोसा जताया था जो कहीं न कहीं टूट रहा है। और सब को पता ही जब-जब किसी शासन ने जनता का भरोसा तोड़ा है जनता ने उसको तोड़ दिया है। बिहार से बाहर लोगों को जरुर लगता है की नीतीश अच्छा कम कर रहे हैं लेकिन हालत दूसरा है। सिर्फ और सिर्फ सत्ता में रहने का तरीका जानते हैं नीतीश और उसी को लेकर चलते हैं। आज के बिहार में किसी चलती है ठेकेदार, माफिया, दलाल और किसका। शायद ही कोई अधिकारी है जो सिर्फ अपने वेतन की कमाई खाता हो। ईमान जहाँ गिरवी रखा जाये वहां क्या कहना। खुली बहस करा लीजिये मामला साफ़ हो जाएगा। किसी भी स्कूल में जाइये बच्चे पढाई क्या करते हैं आपको खुद समझ में आ जायेगा। प्रशासन ठेकेदारों की तरफदारी में लगा है। एक भी ऐसे लोगों की गिनती बता दीजिये जो सही तरीके से काम कर के इस दौरान आगे बढ़ा हो। मायावी दुनिया बाहर से देखने में बहुत शानदार लगती है लेकिन जैसे ही अंदरखाने आईएगा सब नजर आ जायेगा। सड़क बनवाई आपने लेकिन वह भी केंद्र का पैसा था। कहा जाता है की सही शिक्षक एक समाज को बदल सकता है ,बंधु यहाँ तो शिक्षक को गुंडे की तरह दौड़ा-दौड़ा कर पीटा जा रहा है। माफिया की कमाई करोड़ों में और समाज को सही दिशा देने वाले गुरु की औकात सिर्फ कुछ हजार। वह रे शासन और वह रे शासन करने वाले। जिस आशा और विश्वास से जनता ने आपको चुना आपने उसको मिट्टी पलीद कर दिया। मैं या कोई भी बिहारी विकास के विरोधी कैसे हो सकते हैं लेकिन सरकार को लगता है की हम ऐसे हैं। मैं आजकल बिहार में हूँ और सारी चीजें पाने नग्न आँखों से देख रहा हूँ मैं तो विश्वास के साथ कहता हूँ इसे विकास कतई नहीं कहते हैं। अखबारों को तो आपने खरीद लिया है कम से कम अपने ईमान  को भी बरक़रार रखिये। पत्रकार बिहार में खुश हैं की जेपी के इस चेले के राज में खूब मटन-चिकेन हो रहा है। पुराने से लेकर नए सभी लुत्फ़ उठा रहे हैं और जो इससे बाहर हैं उनको शायद ही कोई पूछ रहा है। बिहार विकास करे यह सभी बिहारी चाहते हैं। जो भी हो यह तो कहा ही जा सकता है की जब गुंडे शासन में हों तो फिर किसपे करें यकीं। बहुतों को हो सकता है यह बात चुभे लेकिन दोस्त हकीकत को जरुर समझने की छोटी सी भूल कीजिये। बस बिहार हर तरह से खुशहाल हो।


Feb 6, 2013

बीजेपी की नरेन्द्र-नाथ नीति?

भारत की राजनीति वर्तमान समय में एक उथलपुथल भरे दौर से गुजर रही है। सभी राजनीतिक पार्टियाँ मिशन 2014 पर काम कर रही है। चुनौती हर दल में है, लेकिन बीजेपी को छोड़कर ज्यादातर दलों में नेतृत्व करने वाले का नाम स्पष्ट है। बीजेपी ही वह दल है जिसमे लगातार मंथन जारी है। अब सवाल है की आखिर भगवा ध्वज को लेकर पथ संचलन की बागडोर कौन संभालेगा। अभी इसपर कुम्भ में मंथन जारी है। लेकिन मेरे हिसाब से बीजेपी ने भी स्पष्ट तौर पर संकेत दे दिया है। पहले राजनाथ की ताजपोशी फिर मोदी राग यह लक्ष्य की तैयारी नहीं तो क्या है? कमल खिलाने को नरेन्द्र-नाथ की जोड़ी को एक तरह से मैदान में उतार दिया गया है। दोनों को उनके कार्य पर भी लगा दिया गया है। नरेन्द्र युवा भारत और विकास पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं तो राजनाथ हिंदुत्व को लेकर चलने की बात कर रहे हैं। एक तरह से ड्राइंग रूम राजनीति करने वालों को शांत रह कर मामला देखने की सलाह दे दी गयी है। नरेन्द्र और नाथ की जोड़ी यूँ ही नहीं बनायीं गयी है इसके पीछे भी कारण रहा है। बीजेपी को दिशानिर्देश देने वाले संघ की मंशा रहती है की उसकी पकड़ हमेशा बनी रही और इस दिशा में इससे फिट जोड़ी शायद वर्तमान में नहीं हो सकती थी। गौर करें तो इस जोड़ी की शुरुआत गुजरात विधानसभा चुनाव के समय ही हो गयी थी। नरेन्द्र के स्वामी विवेकानंद यात्रा में नाथ मुख्य तौर से शामिल थे। चूँकि विवेकानंद का बचपन का नाम भी नरेन्द्रनाथ था तो बीजेपी को भी लगा की क्यूँ न ऐसे की किसी जोड़ी की तस्दीक करायी जाये। और यह सर्वविदित है की नरेन्द्रनाथ ने अखंड भारत को विश्व में अलग पहचान दिलाई। और इस नाम को लेकर नरेन्द्र युवाओं में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं, गुजरात में लगातार तीसरी बार सत्ता में आना इसकी सटीक पुष्टि कर देता है। और इस कारण बीजेपी और उसके सलाहकारों को लगा की जब एक नरेन्द्रनाथ इतना बड़ा काम कर सकता है तो अगर दो को मिला कर वर्तमान का नरेन्द्र-नाथ बना दिया जाये तो काम हो सकता है। इसके दो फायदे हैं एक तो युवाओं को लगेगा की उनके युवा भारत का सपना यह जोड़ी साकार कर सकती है और दूसरा की उसके वोट बैंक में भी एक सन्देश जाएगा की बीजेपी अपने पुराने वादों को भूली नहीं है। इसी आधार पर फिलहाल पार्टी ने दो मुद्दे को चुना है एक है युवा और विकास और दूसरा हिंदुत्व। पार्टी को लगता है की यही मुद्दे उसे 2014 में दिल्ली की गद्दी तक ले जाने में सक्षम हैं।इस दिशा में नरेन्द्र-नाथ को लगा भी दिया है। जहाँ नरेन्द्र युवाओं और विकास को टारगेट कर रहे हैं वहीं नाथ साधू-संतों और देशवासियों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं की आज भी उनकी पार्टी हिंदुत्व के मुद्दे पर कायम है। मैं आपको बता दूँ की इसकी झलक भी बीते दिनों देखने को मिली। नरेन्द्र ने दिल्ली के एक  कॉलेज में आयोजित सभा में इसकी एक बानगी भी दिखा दी। 6 फ़रवरी को आयोजित सभा में नरेन्द्र ने युवाओं के सामने भारत की बात बात की जो हर युवा की सोच है। नरेन्द्र एक अच्छे वक्ता तो हैं ही उन्होंने एक अच्छे प्रशासक होने की भी तस्वीर पेश कर दी है। उनके संबोधन में साफ़ तौर पर यह बात नजर आई की वो 6 करोड़ गुजरातियों की नहीं बल्कि 121 करोड़ भारतियों की चिंता करते हैं। नरेन्द्र ने युवाओं से सहयोग की भी बात भी कही तथा साफ़ कहा की अगर एक सुन्दर और विकसित भारत बनाना है तो ऐसे लोगों को लाना होगा जो कर्म में यकीन रखते हैं। साफ़ है की वो अपनी जगह बनाने की कोशिश करते दिखे लेकिन एक चतुराई से। ये तो हुई नरेन्द्र की बात अब आते हैं नाथ पर जिन्हें इस साल बीजेपी की कमान दी गयी। नाथ साधू-संतों और आम जनमानस को यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं की बीजेपी आज भी हिंदुत्व और राम मंदिर के मुद्दे पर कायम है। वो कभी कुम्भ तो कभी कहीं किसी और नगरी में जाकर अपनी बात की पुष्टि करते फिर रहे हैं। आखिर इतना सब होने के बाद कहाँ शंका है की बीजेपी में तैयारी नहीं हो रही है। मैं कह दूँ तो अनौपचारिक तौर पर सब सेट है बस समय का इन्तजार है। यूथ+अध्यात्म+हिंदुत्व +विकास इस मुद्दे पर बीजेपी पूरी तरह से केन्द्रित हो चुकी है। आगे तो आने वाला समय इसकी पुष्टि कर ही देगा बस एक चतुर सुजान की तरह निगाहें जमाये रखने की जरुरत है।

Feb 4, 2013

खोल नयन ज्ञान के.......

बहुत दिनों से मन में हलचल सी थी की कुछ कलम की कलाकारी की जाये। हमारे अभिन्न माइक्रो यूनिक के निदेशक राजिक राज जी ने कहा कुछ प्रेरणादायक लिखिए। राजिक जी हमारे गुरु हैं तो उनकी बातों की अवहेलना करने की हिम्मत नहीं है मुझमे। मैंने उनकी बातों को ध्यान में रखते हुए कुछ पंक्तियाँ लिखी है जिसकी नज़ीर आपके सामने पेश कर रहा हूँ।

खोल नयन ज्ञान के, देख नयी दुनिया
अज्ञानता के तमस छोड़, जला दीप नया कोई,
काली निशा के बीच, बन मृगांक(चन्द्रमा) प्रकाश कर,
निकल लघु पुष्कर से, भागीरथी के राह चल
बन आशा की तरी(नैया), भवसागर के पार देख
बगिया में नया कुसुम खिला, सलिल(जल) बन कर उसको सींच
जीवन बने अनुपम, ऐसा कोई प्रयास कर
खोल नयन ज्ञान के, देख नयी दुनिया
बन भारती(सरस्वती) का किंकर(दास), अम्बर पर भी अधिकार जमा
इस दानव रूपी अंधकार को, भानू(सूर्य) बन कर दूर करो
जीवन बड़ा अतुल(अनोखा) है, इसको मत बेकार कर
खोल नयन ज्ञान के,देख नयी दुनिया
मन में ले नयी अभिलाषा, विश्व विजय का रथ निकाल
राह कठिन की मत कर परवाह, विजयी पताका फहरा कर 
बन दुनिया का महीपति(राजा).
 

Dec 15, 2012

आशीष की मौत का जिम्मेदार कौन ?

वैसे तो मेरा कस्बाई शहर बांका शांत ही रहता है। यहाँ के लोगों को शांति अत्यंत प्रिय है। लेकिन कभी -कभी नदी भी उफ़नाती है तो आसपास का इलाका डूब जाता है। मेरे शहर में मौसम तो करवट ले ही चुका है। वातावरण में नमी का प्रवेश हो चुका है, लेकिन इस शहर पर इसका असर नहीं है। इस मौसम में शहर का तापमान अचानक गर्म हो गया है। वैसे तो यह शांतप्रिय बुद्धिजीवियों और पत्रकारों का ठिकाना है लेकिन कभी -कभी इनकी बेवजह की उग्रता भी देखने को मिलती है। कहते हैं न अपनों के बिछड़ने का दर्द अपनों को ही होता है। हमारे यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। बीते 16 दिनों में शहर ने कई लोगों की असलियत को जाना, पहचाना, कितने तरह के दावों को सुना-देखा, महसूस किया लेकिन अंत में निराशा से ही सामना हुआ। जी हाँ, बीते 29 नवंबर को शहर के जगतपुर मोहल्ले के स्कूली छात्र आशीष का अपहरण हो गया था। पुलिस 14 दिसंबर तक उसे खोज लेने की हवाई फायरिंग करती रही और अचानक 15 दिसंबर को बंदूक से छूटे गोली के खाली खोखे की तरह उस मासूम के निर्जीव शरीर को लेकर सामने आई। माता-पिता तो आस लगाये बैठे थे की सुशासन में सब कुछ अच्छा ही होगा, अंत में एक अच्छी खबर मिलेगी, वो अपने लाल को फिर से गले लगा सकेंगे, बहन को उम्मीद थी की भाई को फिर से राखी बांधेंगे, दोस्तों को यकीन था की उनका अपना आशीष फिर से उनके साथ मटरगस्ती करेगा। काश! ऐसा हो पाता, सब की मुरादें पूरी होती, सब के चेहरे पर मुस्कान होती, सब की आस यकीन में बदलती लेकिन हुआ तो जो मंजूरे खुदा था।  इस मायावी दुनिया से हटाकर उसे  दूर भेज दिया हैवानों ने। क्या कसूर था उसका यह की उसके पिता के पास अपहरणकर्ताओं को देने के लिए 50 लाख रूपये नहीं थे। या फिर वो अपने घर का इकलौता चिराग था? प्रश्न गंभीर है उत्तर इतनी आसानी से नहीं मिलने वाली है। अब एक मूल मुद्दे पर आते हैं की आखिर पुलिस क्या सिर्फ दावे करने के लिए होती है। घटना घटने के बाद ही उसकी नींद क्यूँ टूटती है? विस्मयकारी प्रश्न है, जवाब क्या है पुलिस के  पास। क्या आप सिर्फ नाम के रखवाले हैं या कुछ काम के भी है। अरे कब जगियेगा आप ,जागिये आपकी जरुरत है देश के लोगों को। आखिर क्यूँ अपराधियों को आपका डर नहीं है। बांका की पुलिस क्या आप किसी कार्य को करने में सक्षम नहीं हैं या बात कुछ और है? आपके शहर में लगातार घटना हो रही है और आप उत्सव मना रहे हैं। प्रशासन एक तरफ युवा महोत्सव मनाती है और उसके ही शहर में युवा सुरक्षित नहीं है? अरे ये नाटक बंद कीजिये। कुम्भकर्णी नींद से जागिये और अपने काम को सही ढंग से कीजिये। आखिर क्या गुंडे-बदमाश इस काबिल हो गए की वो आपको ही आँख दिखाने लगे और आप इतने मजबूर। अरे जिम्मेदारी लीजिये सिर्फ अख़बारों और विज्ञापनों के माध्यम से अपनी तारीफ मत कीजिये। आपका काम दूसरा है आम लोगों की हिफाजत उसको अच्छे से पूरा करिए। आपको क्या याद दिलाना होगा की आपका क्या काम है। आप व्यापारियों और रसूखदारों के साथ कम समय दीजिये, आम अवाम की सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान दीजिये। अरे माना की इससे आपके घर की अलीशानता प्रभावित होगी लेकिन आपका काम तो यही है। दूसरी ओर मैं यहाँ के प्रेस से भी एक प्रश्न करना चहुँगा की क्या खबर किसी के जान से भी ज्यादा प्यारी है। मुंबई हमलों के बाद जो इस जमात की थू -थू  हुई थी उससे भी कुछ सबक लीजिये। हर चीज़ को खबर की भांति मत देखिये मानवता का भी ख्याल कीजिये। माना की प्रतिस्पर्धा ज्यादा है लेकिन क्या अगर आशीष के बदले आपके घर का चिराग होता तो भी आप ऐसे ही ट्रीट करते। चूँकि मैं भी पत्रकारिता से सम्बन्ध रखता हूँ इस नाते कुछ चीजों को अच्छी तरह जानता हूँ। आपका पत्रकारिता धर्म आपको आम आदमी के हित में बात करने की हिदायत देता है यह शायद आप अच्छी तरह जानते समझते हैं। आप किसी को कुछ दिलाने की लड़ाई उसके हित को देख कर लड़ने की बात कहते हैं लेकिन जब बारी करने की आती है तो आपको सिर्फ अपना और अपने संस्थान का हित याद आता है। मुझे याद है जब मैंने अपने एक स्थानीय दोस्त को कहा था की मैं पत्रकारिता का छात्र हूँ तो वो बड़ा ही विस्मयकारी निगाहों से मुझे घूरने लगा था। आज मुझे लगता है की वो एक हद तक सही था। मैं बहुत दिनों से बांका में हूँ और देखता हूँ की किस तरह अख़बार कुछ खास लोगों की तारीफों के पुल बांधते अघा नहीं रहे हैं। आशीष प्रकरण में निःसंदेह आपने एक अच्छी आवाज़ उठाई लेकिन कहीं न कहीं खबरों की तलाश में आपने पत्रकारिता के लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन किया। ज्यादा उतावलापन कभी-कभी गलत परिणाम देती है यह आपने आरुषि-हेमराज हत्याकांड के बाद भी नहीं समझी। हो सकता है आपको लगेगा की मैं पगला गया हूँ जो ऐसी बात कह रहा हूँ लेकिन मुझे लगता है अगर आप इस मामले में कुछ बातों को लेकर सब्र कर लेते तो अच्छा रहता । हमारे प्रिय पत्रकारबंधु नैतिकता को किराये पर न रखते हुए काम करें तो राज-समाज के लिए सही  रहेगा। देश के चौथे स्तम्भ की गरिमा का थोड़ा बहुत ख्याल करते चलें तो बेहतर होगा।  ज्यादा क्या कहूँ न ही पुलिस का कुछ होगा, न ही प्रशासन को कुछ चेतना आएगी और न ही मीडिया कुछ सोचेगा पर जिसका अपना चला गया उसका दुःख कौन बांटेगा इसपर सोचने की जरुरत सभी को है ताकि आगे से और आशीष को जान न गंवानी पड़े। 

Dec 1, 2012

क्या न्याय मिलेगा बीबी शहजादी को?

कहते हैं मानव जीवन के भलाई के लिए समाज का होना परम आवश्यक है। परिवार के बाद समाज ही एक ऐसी संस्था है जहाँ मनुष्य का नैतिक और सांस्कृतिक विकास होता है। कहें तो जीवन रूपी इस नैय्या को भवसागर के पार लगाने में समाज की बहुत ही महती भूमिका होती है। पंच परमेश्वर को पढने के बाद तो लगता है इस न्याय रूपी मंदिर में सभी के साथ एक जैसा व्यवहार होता है। लेकिन अब दौर जुम्मन शेख और अलगू चौधरी वाला नहीं रहा, अब नियत के मामले में लोग बदल चुके हैं। एक बहुत ही हृदयविदारक घटना ने मुझे अन्दर से समाज और राजनीति को लेकर सोचने को विवश कर दिया है। कभी एक जमाना था जब राजनीती देश को जोड़ने का काम करती थी। समाज के उत्थान के लिए राजनीतिज्ञ आगे रहते थे लेकिन समय बदला, लोगों की जरूरतें बदली और बदल गया सामाजिक ताना-बाना।  मैं आजकल बिहार में रह रहा हूँ तो जरुर है  की यहाँ की घटनाओं को बारीक़ नजरों से देखूं .कल यानि की शनिवार को एक ऐसी ही खबर जो अख़बारों में प्रमुखता से आई थी, जहाँ तक मैंने पढ़ा एक अख़बार ने तो शानदार तरीके से छापी थी। किस तरह निर्दयी समाज ने एक  औरत को तडपा-तडपा के मार दिया। एक तरफ राज्य सरकार महिलाओं के हितों के प्रति अपने वादों को प्रचारित करते रहती है वहीँ दूसरी ओर उसके राज्य के जनप्रतिनिधि तुगलकी फरमान सुनाते फिरते हैं। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ बीबी शहजादी की जिसे तडपा-तडपा  के मार दिया गया। पंचायत के प्रमुख की बात न मानने की ऐसी सजा मिली जिसकी कल्पना भी एक सभ्य समाज नहीं कर सकता। एक तरफ हम अपने को न्यायप्रिय देश कहने का दंभ भरते हैं वहीँ दूसरी ओर अपने देश के नागरिकों को ही न्याय नहीं, वाह रे देश और वाह  रे तेरा कानून। जी हाँ वह राज्य जहाँ की सरकार पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत  आरक्षण देती है वहां भरी पंचायत में ऐसे कृत्य को अंजाम दिया जाता है तो कहने की बात ही क्या? बिहार के पूर्णिया जिले के असियानी गांव में बीबी शहजादी को पहले तो बेवजह तंग करने की साजिश रची गयी फिर उसे मरने के लिए छोड़ दिया गया। समूचे गांव वालों ने भी गजब के धैर्य दिखाया कोई भी उसकी मदद को नहीं आया। और जब उसके रिश्तेदार आये तो समाज के पहरेदारों ने उन्हें  भी धमकी देकर उसे मरने छोड़ देने को कहा । क्या ऐसे ही चलेगी व्यवस्था और ऐसे ही होगा हमारा विकास। किसी के दामन को दागदार कोई कैसे कह सकता है। खैर अगर ऐसा ही होता रहा तो चला अपना देश, क्या लोग ऐसे में बंदूक उठाने को मजबूर नहीं होंगे। और बड़ी बात तो यह की उस मजबूर औरत के नौनिहालों का क्या होगा, कौन लेगा उनकी  जिम्मेदारी? कौन देगा उनको माँ का वात्सल्य? क्या इसका जवाब है किसी के पास। क्या किसी के गर्भ में पल रहे बच्चे के बारे में दूसरा ही कुछ कह सकता है, दूसरा ही कुछ भी आरोप लगा सकता है। क्या अब इसका भी प्रमाण देना होगा की किसी के गर्भ में पल रहा बच्चा उसका है की नहीं? क्या एक औरत हमेशा शक की नजरों से ही देखी जाएगी? आखिर इस दकियानूसी विचार वालों से हमें कब छुटकारा मिलेगा या फिर ऐसे ही चलता रहेगा। क्या बीबी शहजादी को इन्साफ मिलेगा या  उसके मौत को दबा दिया जायेगा। क्या कहीं  इसपर राजनीति तो शुरू नहीं हो जाएगी ये प्रश्न बहुत विचारनीय हैं? क्या जकी अहमद जैसे सरपंच का कुछ होगा या फिर राजनीति की ओट में वह बच निकलेगा। और एक सवाल हमारे समाज से भी की क्या अगर हमारा कोई अपना होता तो हम भी उसे ऐसे ही छोड़ देते। अब जब बीबी शहजादी के बच्चे इन्साफ मांगेंगे तो क्या उनको इन्साफ मिल सकेगा प्रश्न बड़ा है। समय का इंतजार सब सामने आ जायेगा। सड़क पर गाड़ी फिर दौड़ेगी लेकिन क्या पुराने व्यवस्था पर ही या कुछ नया होगा?