भारतीय हॉकी में कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है ऐसी खबरे रोज ही आ रही है |आखिर क्या हो गया अचानक की जो टीम कल तक फरवरी में होने जा रहे वर्ल्ड कप की तय्यारी में लगी थी , आज वो इस तरह का रुख अपनाये हुए है |कारणों के तह में जाए तो इसका सबसे बड़ा कारण खिलाडियो को मिलने वाले पारिश्रमिक से है |बात भी सही है कब तक कोई बिना पैसो के काम चलाएगा |भारत जैसे देश में जहाँ कभी यह खेल मुख्य रूप से मौजूद था शीर्ष पर ?आज भी चाहे जो भी हो बैट-बॉल चाहे कितना भी प्रगति कर ले पर देश का राष्ट्रीय खेल नहीं हो सकता ,वहां चाहे नाम का ही हो लेकिन रहेगा तो हॉकी ही |मुझे लगता है शायद ही ऐसा कोई देश होगा जहाँ राष्ट्रीय खेल की स्थिति इतनी नाजुक हो, इसलिए तो भारत को अदभूत देश की संज्ञा दी गयी है |खैर अब कुछ तमाशे की भी बात हो जाये तो मतलब कुछ निकले |खबर आई की पुणे में भारतीय हॉकी
के खिलाडियो ने प्रशिक्षण शिविर में भाग लेने से मना कर दिया है और कारण धन को बताया गया है |एक बात तो सही है भारत में एक तरफ जहाँ क्रिकेट में धन टनन हो रहा है तो वहीं हॉकी में ईश्वर के नाम पे कुछ दे -दे बाबा वाली स्थिति है |क्रिकेट खिलाडी जहाँ इनकम टैक्स देने में देश में अपना एक स्थान बनाते है वहीं हॉकी के खिलाडी तो सपने में भी इसके बारे में कभी नहीं सोचते है |शायद ऐसी स्थिति इसलिए है की भारतीय हॉकी टीम ने अब तक कुल आठ ओलंपिक गोल्ड मेडल जीते है ,एक वर्ल्ड कप में भी गोल्ड जीता है टीम ने एशियन खेल में भी दो गोल्ड जीता है |देश में जहाँ स्थिति यह है वही क्रिकेट टीम ने अभी तक सिर्फ एक १९८३ का वर्ल्ड कप और एक २०-२० वर्ल्ड कप ही जीता है बड़े लेवल पर,पर शान में दोनों का जमीं आसमान का अंतर है |अपने देश में ऐसा ही होते आया है किसी को अर्श पे तो किसी को रसातल में जगह दी जाती रही है |मेरे हिसाब से जो टीम के मेम्बरों ने किया है वो बिल्कुल सही है |कोई कब तक झूठ के नाम को लेकर चलते रहे ,आखिर कोई बिना उचित पारिश्रमिक के कितने दिन कोई खट सकता है |टीम के खिलाडियों का कहना है जो सहारा का लोगो क्रिकेट टीम के खिलाडी लगाते है वही तो हम भी धारण करते है, लेकिन जिस गाड़ी से क्रिकेट टीम के खिलाडी सफ़र करते है हम तो उसे दूर से देख के ही आहें भरते है |वाह!रे देश एक ही चीज़ के लिए अलग अलग दाम | हॉकी टीम के खिलाडी अगर कोई टूर्नामेंट जीत भी जाए तो उनको थोडा कुछ मिल जाता है ,वो भी एक इंतिजार के बाद समय पर तो कुछ मिलता ही नहीं है |लेकिन अगर कोई मैच हार जाते हैं तो कुछ से भी हाथ धोना पड़ता है |एक बात समझ से बाहर है की आखिर ऐसी दोतरफा नीति को लेकर हॉकी को बर्बाद किस लिए किया जा रहा है |टीम के खिलाडियों से कहा जाता है की देश के नाम को उपर उठाओ तो मैं पूछना चाह रहा हूँ की कोई क्या पेट में कपडा ठूस कर देश के नाम को आगे बढा सकता है क्या ?एक बात इसपर और क्या अगर हम पूरी संतुष्टि के साथ कोई काम नहीं करे तो वो कभी अच्छा हो सकता है क्या ?इस प्रश्न का जबाब तो हम सभी के पास शायद यही होगा की नहीं तो फिर टीम के साथ ऐसा किस लिए हो रहा है |हम चाहे कितना भी कुछ सोचे लेकिन अगर काम करने वाले संतुष्ट नहीं होंगे तो कोई भी काम नहीं होगा |हॉकी टीम के साथ भी ऐसा ही कुछ लागु होता है |लगातार अगर हम जीत के बारे में ही सोचेंगे और उसके बेसिक बातो पर ही ध्यान नहीं देंगे तो वो पूरा कैसे होगा ?जीत के लिए तो सभी सोचते है लेकिन इसके लिए भी कुछ करना होगा यह किस कारण से नहीं सोच पाते है |हम सिर्फ रसगुल्ले ही खाना चाहते है लेकिन उसके लिए अच्छी सामग्री अगर हम नहीं जुटा पाते है तो यह कल्पना बेकार है |हॉकी को अगर जीवित रखना है तो खिलाडियों का भी ध्यान रखना ही होगा ,अगर खिलाडी ही खुश नहीं रहेंगे तो कुछ भी अच्छा होना मुश्किल है |तो अगर हमे भारतीय हॉकी को फिर से वर्ल्ड की बेस्ट टीम बनाना है तो खिलाडियों को भी गोल्ड तो देना ही होगा |आखिर हिंदी सिनेमा में एक गाना भी इसकी को लेकर है की "बाप बड़ा न भैया ,सबसे बड़ा रुपैया " ,लेकिन यहाँ तो रुपैया ही नहीं है तो होगा कैसे |तो भारतीय हॉकी के प्रशासको को बयानबाजी छोड़ इसकेलिए सोचना चाहए ताकि फिर से इस खेल में सोने का तमगा देश में आ सके |
Jan 12, 2010
Jan 9, 2010
नितिन गडकरी के नए संकेत
नितिन गडकरी ने बीजेपी के प्रमुख का पदभार सँभालते ही कुछ अलग तरह के संदेश देने शुरू कर दिए है नितिन गडकरी को जमीन से जुडा हुआ नेता माना जाता है ,उन्हें काम करने वाले नेता के रूप में एक अलग पहचान मिली हुई है कल तक उन्हें सिर्फ़ महाराष्ट्र तक ही सीमित नेता माना जाता था ,लेकिन आज गडकरी देश के प्रमुख पार्टी भाजपा के मुखिया है बहुत लोगो को ताजुब भी हुआ जब नितिन की ताजपोशी की खबरें मीडिया में आनी शुरू हुई ,लेकिन किसी को भी कुछ भी हो लेकिन गडकरी तो दिल्ली पहुँच ही गए गडकरी की माने तो इसके पहले उन्होंने इस नए शहर में रात भी नहीं बितायी थी अब तो ज्यादातर समय बिताना होगा खैर इस चीज़ को जाने दीजिये नितिन ने पार्टी में मुख्य पद सँभालते ही यह कह दिया है की अब ड्राईंग रूम की राजनीती नहीं चलेगी और नेताओ को जमीन से जुड़ना ही होगा नितिन ने भागवत की बात को दोहराते हुए कहा है की जिस भवन की नीव मजबूत होती है वही भवन असल में मजबूत होता है ,अच्छी कार्यकुशलता भी उस भवन को नहीं बचा पाती जिसकी नीव कमजोर होती है गडकरी के ये बात उनलोगों के लिए एक चुनौती हो सकती है जो सिर्फ़ दिल्ली में बैठ कर राजनीती करते है लगातार पार्टी की हार के कारण को भी ड्राईंग रूम पोलिटिक्स ही बताया जा रहा है गडकरी के ये संकेत एक तरह से बहुत ही अच्छे है इससे पार्टी में सही मायनो में काम करने वाले लोग तो मिलेंगे ही देश को भी अच्छे नेता मिलेंगे आज लोग गावं में जाना नहीं चाह रहे है सिर्फ़ चुनाव के समय ही उनको इनकी याद आती है गडकरी के बात में दम तो है सही में आज योजनाये तो बनती है मगर वो फेल हो जाती है सबसे बड़ा इसका कारण है हम उस नजरिये से योजना बना ही नहीं पाते है जिसकी गावं में वहां के लोगो को जरूरत है गडकरी ने इस बात के एक संकेत दिए है की जो लोग जमीन से जुड़े है उनको ज्यादा मौका मिलेगा आज जिस तरह से राजनीती में जमीन से जुड़े लोगो की उपेक्षा हो रही है उनके लिए जरूर यह एक अच्छी ख़बर है नितिन ने यह वादा किया है की पार्टी में वे ऐसे लोगो को भर देंगे जो सही में काम कर रहे है उनको तरहीज भी दी जाएगी नितिन ने भी एक आम से इतने दूर तक का सफर तय किया है ,तो इतना तो तय है की अब पार्टी में आम को जगह जरूर मिलेगी नितिन ने राहुल की वर्तमान राजनीती को भी सराहा है जो इस बात का संकेत है की वो भी कुछ इसी तरह के व्यक्तियो को पसंद करते है जो भारत को असल में समझता हो या इसकी कोशिश में लगा हो
Jan 7, 2010
अमर का एलान
अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी के प्राथमिक सदस्य बने रहने के अलावा सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है इस इस्तीफे का कारण स्वास्थ्य को बताया है उन्होंने ,बड़ी ही अजीब बात है की जब अमर सिंह सिंगापुरमें अपना इलाज़ करवा रहे थे तब उनको अपना इस्तीफा नही दिया गया अमर सिंह को लगा की भारत जाकर कुछ और दिन पोलिटिक्स में मज़े किए जाए फिर इस्तीफा अमर सिंह को राजनीती में जोड़ -तोड़ का बादशाह माना जाता रहा है ,लेकिन इस बार वही टूट गए हैं न अजीब सी बात ?खैर जो भी हो लेकिन समाजवादी पार्टी को अलग पहचान दिलाने में अमर की भूमिका को कोई नकार नही सकता ,एकाएक देश में लोग इस पार्टी को जानने लगे तो इसका एक बड़ा कारण थे अमर सिंह अमर सिंह ने समाजवादी को पूंजीवादी भी बनाया इसमे कोई गफलत नही है ,मुलायम तो लोह्यिया के नक्से कदम पर चल रहे थे लेकिन अमर ने उन्हें बताया की देश में राजनीती का मतलब सिर्फ़ और सिर्फ़ फायदा और लगातार सुर्खियों में रहना ही है फिर क्या मुलायम को भा गई अमर की नीति और मुलायम बन गए एक अलग नेता ,देश को परिवार मानने वाला अब परिवार को ही देश मानने लगा तो क्या यह एक बदलाव नही है अमर सिंह ने इस पार्टी के लगभग सभी पुराने लोगो को पार्टी से तोड़ दिया है और अब ख़ुद भी अलग हो गए ,शायद हो सकता है अमर मुलायम से अपनी कोई दुश्मनी निकाल रहे होहो सकता है की जिस तरह से मुलायम ने अपने पुत्र अखिलेश को प्रदेश की जिम्मेदारी देने की धीरे धीरे तय्यारीसुर कर दी है उससे भी अमर को लगा होगा की हो सकता है की अब उनकी पूछ कम हो जाए इससे पहले ही उपाय करना चाहए अमर सिंह को राजनीती में एक अलग पहचान मिली है जोड़ तोड़ को लेकर ,चाहे पार्टी में पैसा जुटाना हो या और कुछ अमर को इसमे महारत हासिल है आख़िर लोकसभा चुनाव के बाद ही लगातार अमर को अपने पार्टी में बनाये रखने के लिए मुलायम ने जो भी त्याग किया हो आज ख़ुद अमर ने ही उनसे किनारा कर लिया है अब तो आने वाला समय ही बताएगा की क्या होगा इस पार्टी का अमर ने कल्याण को भी पार्टी से जोड़ कर एक अलग जो अपनी पहचान दी थी क्या कोई और इस पार्टी में वो कर सकेगा इसको लेकर ख़ुद मुलायम भी परेशां है
Jan 5, 2010
ज्योतिष महाराजों की राजनीती में पूछ
आज बहुत दिनों बाद लिख रहा हूँ झारखण्ड में सब कुछ संपन्न हो चुका है ,गुरूजी ने राज्यके नए मुख्यमंत्री के रूप में ३० तारीख को रांची के चर्चित मोराबादी के मैदान पर सुबह के १०:३० बजे शपथ ले लिया है बड़ी ही गौर करने वाली बात है अभी से ही राज्य को चलने के लिए ज्योतिषोंका सहारा लिया जाने लगा है ,गुरूजी को पहले दिन के २:०० बजे शपथ लेना था लेकिन ज्योतिष लोगो के अनुसार समय सुबह वाला ज्यादा शुभ था तो गुरूजी ने आनन् फानन में नया निर्णय ले लिया खैर जो भी है आजकल राजनीती में ज्योतिषों की पुच बढ़ गई है ,हर दल चुनाव के पहले ज्योतिषों से पूछता है की कौन सा प्रत्यासी जित सकता है उसी अनुसार टिकेट दिया जाता है ,बात यहीं ख़त्म नही हो जाती है उसके बाद यह भी पुचा जाता है की प्रचार के लिए किसे भेजा जाए जो शुभ हो और जीत पक्की करे यह तो बात हुई शुरुआत की बाद में चुनाव के दिन भी बूथ पर उन्ही लोगो को बैठाया जाता है जो शुभ हो असली बात तो इसके बाद शुरू होती हाउ जब मतदान हो जाता है ज्योतिषों की पूछ में जबरदस्त उछाल आता है है वो तो मुख्य ही भूमिका में आ जाते है शुरू होता है गहन सलाह का काम ,कौन सा दल सबसे बड़ा होगा क्या होगा ?कोण सा नेता जीतनेवाला है ?क्या किसी को बहुमत आएगा की नहीं ?किस पार्टी के किसके साथ जाने के उम्मीद है ?इन बातो की जानकारी लेकर परिणाम से पहले ही सुरु हो जाती है सत्ता की दौडधूप ,सुरु हो जाता है भागमभाग परिणाम के दिनों के बाद तो और भी महत्व बढ़ जाता है ज्योतिष महाराजो का ?हर दल जो कुछ न कुछ सीट जीत कर आया है वह यह पूछने लगता है की किस पार्टी के साथ जाया जाए जो अच्छा होगा इसके आधार पर सरकार बनती है सिर्फ़ इतना तक ही सीमित नही होता है ,हर किसी के शपथ ग्रहण समारोह भी इनके इशारों पर ही तय होता है पदभार ग्रहण करने के बाद भी अपने नए आवास ,कार्यालय हर जगह पर ज्योतिषों की शलाह ली जाती है किस तरफ़ टेबल लगाया जाए ,कुर्सी की दिशा क्या होनी चाहए सब कुछ इनकी सलाह पर ही होती है अगर बात यहीं ख़त्म हो जाती तो कुछ बात नही था आख़िर इतने मुश्किलों के बाद जो सत्ता मिली है तो इतना करना लाजिमी है अब इतने के बाद इस बात को लेकर ज्योतिष महाराजो की सत्कार की जाती है की सरकार कितने दिनों तक चलेगी ,किस कारण से सरकार गिरेगी ,कौन समर्थन वापस लेगा अगर सरकार गिरती है तो इसे उठाया कैसे जाएगा किसका सहारा लिया जाए जो यह फिर से आ जाए आदि चीजों पर बात की जाती है अगर देखा जाए जो आज के इस राजनीती में किसी का कोई महत्त्व नही है अगर महत्त्व है तो सिर्फ़ ज्योतिष महाराजो की ,सत्ता की चाभी असल में उनके हाथ में ही है क्या मैं कुछ ग़लत कह रहा हूँ ?आपकी क्या सोच है ?
Jan 4, 2010
जय हो ज्योतिष महाराज
बहुत दिनों बाद आज फिर से इस ब्लॉग पर अपनी भावना व्यक्त कर रहा हूँ सोच रहा हूँ क्या लिखूं पर जब शुरुआत कर चूका हूँ तो अंत भी तो करना ही होगा बहुत लोग कहते हैं की पता नही आप इतना कुछ कैसे कह लेते हैं ,चलिए आज कुछ मिट्ठी बात ही करता हूँ मैं कभी सोचता हूँ तो लगता है की दुनिया बड़ी ही अजीब है ,पर फिर एक मिनट ठहरकर सोचता हूँ तो लगता है अपनी जगह ठीक ही है यह दुनिया आपको भी लगता होगा की क्या अजीब सी बात कर रहा है आज कुछ अता पता नही उलटी सीधी बकवास लेकिन आज मैं थोड़ा अलग लिख रहा हूँ कुछ अलग चीज़ ,शायद आपको जानकारी होगी आजकल देश दुनिया में एक नया प्रचलन चला है ज्योतिष सलाह की हर काम से पहले देखिये आज किसी को नौकरी नही मिली ,शादी नही हुई बस चले गए ज्योतिष के पास बाबा जो कहें उसी आधार पर आगे काम करना है और अगर किसी तरह बाबा की बात सही हो गई तो फिर कहना ही क्या वो तो घर के सदस्य ही हो गए ?चाहे कुछ भी हो जुकाम ,सरदर्द ,पेट ख़राब कहीं नही जाना है सिर्फ़ बाबा के पास ही इसका कुछ हो सकता है सही में न आज इन बाबाओ की पूछ में शेयर बाज़ार से भी ज्यादा उछाल आ रहा है बच्चे का नाम क्या रखना है ,घर में किस तरह की पेंटिंग करवानी है ,सामान किस दिशा में रखना है सारा कुछ यही तय करते है अगर बात यहीं ख़त्म हो जाए तो कुछ राहत है पर आज तो यह बहुत चरम पर है किन लोगो को दोस्त बनाना है ?किस्से दुश्मनी करनी है? सारा कुछ निर्णय वही कर रहे है आजकल ज्योतिष महाराज ही आज यह भी तय करते है की बच्चा किस महीने जन्म लेना चाहए की वो अच्छा होगा ज्यादा तो मैं इनका गुणगान नही करना चाह रहा हूँ पर सारे लोगो को एक सलाह दे रहा हूँ की इस काम में बहुत फायदा है साइड से यह किया जा सकता है वैसे आपका क्या ख्याल है इस विषय पर जरूर बतायिएगा ?
Dec 8, 2009
राहुल के बयान का मतलब
राहुल गाँधी आजकल खूब दौरे पे है ,कभी उत्तरप्रदेश कभी पंजाब तो कभी झारखण्ड .झारखण्ड में तो फिलहाल चुनाव भी चल रहे है तो वहां तो दौरा करना ही चाहिए .राहुल गाँधी तो लगातार विकास की राजनीती की बात भी कर रहे है ,वो अपने बयानों को लेकर भी खूब सुर्खियों में रहते है ,इधर भी झारखण्ड में चुनाव प्रचार में जो उन्होंने कहा वो देश की एकता और केन्द्र राज्य संबंधो में आपसी खीचतान को स्पस्ट करती है .झारखण्ड के लातेहार में एक चुनावी सभा में कांग्रेस के प्रत्यासी के लिए भाषण में उन्होंने कहा की उत्तरप्रदेश ,बिहार ,और झारखण्ड में कांग्रेस की सरकार नही है इसलिए केन्द्र से पैसा नही पहुँच पाता है ,राहुल यहाँ इस बात को भूल गए की ये बात इन तीन राज्यों को लेकर ही नही और भी जगह के लिए हो सकती है जहाँ कांग्रेस की सरकार नही है .कुछ दिन पहले कुछ दिन क्या अभी भी बिहार के मुख्मंत्री नीतीश कुमार येः आरोप लगाते है की केन्द्र सरकार बिहार के साथ सौतेला बर्ताव कर रही है जिसके कारणबिहार को जो उचित राशिकेन्द्र की और से मिलनी चाहिए वो नहीं मिल पा रहा है .बिहार में पिछले साल आई बाढ़ को लेकर भी नीतीश ने यही बात कही थी वो हमेशा से एक ही आरोप लगा रहे है ,इसके जबाब में केन्द्र सरकार का कहना है की बिहार को उचित राशि दी जाती है पर वो उसका उपयोग नहीं कर पाता है ,बात किसकी माने यहाँ पर नीतीश कुमार की या केन्द्र सरकार की अगर नीतीश की बात पर गौर करे तो राहुल गाँधी के इस बयान ने इस चीज़ को स्पस्ट कर दिया है की केन्द्र वास्तविक में कुछ दूजे ढंग का बर्ताव कर रहा है .राहुल गाँधी एक तरफ़ तो ये कहते फिर रहे है की उनका लक्ष्य देश का विकाश है दूसरी तरफ़ इस तरह का बयान देते है तो क्या राहुल की मनसा वास्तविक में कुछ और ही तो नहीं है .देश का विकाश तभी हो सकता है जब राज्य विकसित हो और राज्य तभी विकसित हो सकते है जब केन्द्र और उसके सम्बन्ध अच्छे हो ,विकास योजनाओ का लाभ मिले उसे .लेकिन एक बात जो सही है की राजनीति में कुछ भी हो सकता है तो शायद ये सही है .कम से कम राहुल के इस बयान ने तो कुछ कह ही दिया है इस लोकोक्ति को लेकर .
Dec 4, 2009
कांग्रेस की बिहार स्थिति
कांग्रेस पार्टी द्वारा राज्यों में जल्द ही पार्टी संगठन के चुनाव कराने जाने के आसार है ,पार्टी का अगला लक्ष्य उत्तरप्रदेश में २०१२ का विधानसभा और बिहार में २०१० के विधानसभा चुनावों पर है ,उत्तरप्रदेश में तो पार्टी को कुछ सफलता भी इस लोकसभा चुनाव के दौरान मिली थी लेकिन बिहार में अपने पुराने सहयोगियों से अलग होकर ख़ुद चुनाव लड़ना पार्टी के लिए कोई खास कामयाबी भरा नहीं रहा .पार्टी की स्थिति बिहार में कुछ अच्छे नहीं है ,यहाँ पार्टी में ऐसा कोई नेता नहीं है जो कम से कम पांच सीट भी जिताने की कुव्वत रखता हो .ख़ुद पार्टी के प्रदेश प्रमुख जगदीश शर्मा का वोटरों पर तो जाने ही दीजिये अपनी पार्टी के लोगो पर ही कोई खास नियंत्रण नहीं है .पार्टी की स्थिति एक तरह से कहा जाए तो अभी असमंजस वाली ही है की अगले चुनाव में क्या ख़ुद अकेले ही लड़ा जाए या फिर किसी से गठबंधन कर के ?पार्टी के कई नेता तो गठबंधन के फिराक में है लेकिन आलाकमान के कड़े रुख के सामने कोई कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं कर रहा है .पिछले लोकसभा में पार्टी को महज २ सीट ही मिल सका जो पिछली बार ४ था .पार्टी ने एक चीज़ जो बिहार में पायी वो ये क्या की उसके पुराने वोटर धीरे धीरे उसका साथ पकड़ रहे है ,लेकिन पार्टी को कोई खेवनहार नहीं मिल रहा है जो उसका पारघाट लगा सके ,.
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