Oct 21, 2011

क्या होगा अडवाणी का बेड़ा पार?

बूढ़ी हड्डी में आई नई जवानी है 
अडवाणी ने फिर एक जिद ठानी है,
निकल पड़ें हैं रथ लेकर 
जनता को जगाने 
भ्रष्टाचार, महंगाई 
को देश से भगाने
घूम रहे हैं शहर-शहर 
कर रहे  हैं लोगों की जय-जय कार
प्रधानमंत्री बनने की हो रही है तैयारी 
पर पार्टी के लोग ही पड़ रहे  हैं भारी,
मन में रेसकोर्स का तूफान है 
पीएम की कुर्सी में ही बसती अब उनकी जान है.
टीवी-पेपर पर जारी है बहस,
लेकिन नेताजी दिखते हैं बेबस 
हर ओर तमाशा चालू है,
यह आदमी थोड़ा दयालु है,
रथ का पहिया घूम रहा 
नेताजी का मन झूम रहा,
बढ़ने लगा है विश्वास,
अबकी बहुत है आस 
बस एक मौके की है तलाश,
क्या नेताजी का सपना बनेगा झकास,
या फिर हो जायेंगे नेताजी खल्लास?
अब तो समय बताएगा 
की नेताजी मुस्कुराएंगे 
या फिर हारकर राजनीति से बाहर हो जायेंगे
करें इंतजार, होगा कुछ अद्भुत चमत्कार 
शायद हो जाये नेताजी का बेड़ा पार?


Sep 27, 2011

फिर घिरे राहुल?

आज बहुत दिनों बाद कुछ लिखने बैठा हूँ. बहुत दिनों से लेखनी खामोश थी कुछ कारण थे साथ ही कुछ मजबूरी भी थी. खैर जो भी हो अगर इन्सान की जिंदगी में मजबूरी न हो तो फिर जीवन ही क्या? चलिए अगर मजबूरी की बात करें तो आजकल राहुल गाँधी भी खासे मजबूर हैं, करें तो करें क्या लगातार पार्टी और सरकार की किरकिरी हो रही है जिस मुद्दे पैर बात होती है वहीँ हर कोई नीचा दिखाने की कोशिश करता है. आप ही बतायिए एक अकेला आदमी क्या करे और क्या न करे और उसमे भी अगर ऐसे रणनीतिकार हों जो अच्छा तो कर नहीं सकते और बुरे वक्त में साथ भी नहीं दे सकते तो क्या किया जाये? बेचारे युवराज ने बड़ी कोशिश की थी तब जाकर पार्टी उत्तरप्रदेश में कुछ हद तक जगी थी लेकिन अपनों ने वहां भी सब गुड का गोबर कर दिया. आजकल कश्मीर में भाषण दे रहें हैं और युवाओं से अपील कर रहे हैं की राजनीती में आईये आपको हर कुछ मिलेगा. चलिए जो कम परनाना, नानी और पापा न कर सके वो सायद ये कर दें. पैर संभावना अति कमजोर है. इधर जो कुछ भी था अन्ना ने बिगड़ दिया और अब घोटाला जान मर रहा है कल तक गठबंधन के लोग लपेटे में थे आज तो अपने भी आने वाले हैं. अब बाबा को कुछ सूझ नहीं रहा है की क्या करें ,यूथ ब्रिगेड भी सिर्फ दिखावे को रह गयी है, सही कहते हैं बुरे वक्त में हर कोई साथ छोड़ देता है वही हो रहा है. और तो और अब नरेन्द्र मोदी भी एक चुनौती बन गएँ है आखिर करें तो करें क्या? ऊपर  से जनता का अलग दबाव हर तरफ समस्या ही समस्या है जनाब हल कोई नहीं? वैसे यह तो है की युवराज कभी निराश नहीं होते अरे आज नहीं तो कल तो दिन सही हो ही जायेगा. अब तो आने वाले समय का इन्तजार है. जो भी हो बाबा की अभी तो हवा हो गयी है. वक्त का इन्तजार आप भी कीजिये और हम भी. हाँ अब मैं आपको यहाँ मिला करूँगा पुनः वापसी हो चुकी है.

Jan 7, 2011

अगर जनता जाग गयी तो ?

आज देश के सामने एक विकट समस्या आन खड़ी हुई है| दिन पर दिन नए-नए घोटालों  की खबर उजागर हो रही है, कभी यह घोटाला तो कभी वह| कभी देश के राजा को कभी मंत्री| लेकिन इन सब का खामियाजा जिसे भुगतना पड़ रहा है वह है देश की प्रजा या कह सकते हैं तथाकथित रंक| जिम्मेदार लोग तो अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, आम लोगों के पैसों को डकारकर, शायद उनका यह सोचना है की आखिर सत्ता मिली ही तो है डकारने के लिए| लेकिन जैसा कहते हैं डकारने में भी कुछ फर्क होता है, कौन डकार रहा है| अगर गरीब डकारेगा तो लोगों के उपहास का केंद्र बनेगा, लेकिन अगर अमीर डकारेगा तो लोग समझेंगे की साहेब ने अच्छे से आज कुछ खाया है| आजकल  समूचा देश ही खाने- खिलाने की कोशिश में लगा हुआ है| कोई छोटे बाबु की तरफदारी कर रहा है तो कोई बड़े बाबू की चाकरी| लेकिन सबसे बड़ी और दुखद बात यह है की आजकल देश के नीति निर्धारक सबसे भूखे हो गए हैं| उनकी तो पेट भी इतनी बड़ी है की कभी शायद ही भरे| लोग उनकी तरफदारी में लगे रहते हैं की साहेब कुछ दे दें| आखिर अगर सोना टूटेगा तो कुछ अंश तो साथ वाले को मिलेगा| नीति तो अब पैसों से ही बनने लगी है और इसके बारे में बताना मुर्खता ही होगी| अगर आपके पास माल है तो आप देश में आपने ढंग से कानून बना सकते हो, बनवाना इसलिए नहीं की चाहे बनाओ या बनवाओ फायदा तो आपको ही होगा| खबर आती है की इतने लोग ठण्ड से मर गए, मरने दो सालों को अपने को क्या मतलब| अपने तो सुख से हैं न| आज इतने लोगों को रोटी नहीं मिली, सिर छुपाने को जगह नहीं है, क्या बकवास कर रहे हो यह बताओ की अमुख पार्टी वाले डील का क्या हुआ| अभी भी कुछ कह रहा है की और कुछ चाहता है|  अब प्रश्न उठता है की आखिर देश में किसका शासन है यह है भी की नहीं| या पूरे अंधेर नगरी ही है| किसी गरीब से पूछो तो कहेगा की अमुख साहेब कह के गए हैं की इस बार कुछ करेंगे लेकिन हमारा तो काम ही है इन्तजार करना, सो  कर रहे हैं| आम लोगों का दर्द चरम पर है लेकिन सरकार और देश चलाने वाले अभी भी निंद्रा में हैं| पता नहीं की यह कौन सी निंद्रा है, शायद कुम्भकर्ण वाली तो नहीं, लेकिन दुर्दिन आने पर वह भी जगा था चाहे उसका खुद का ही दुर्दिन ही क्यूँ न हो| लेकिन क्या देश के लिए इससे भी बड़ा दुर्दिन होगा जहाँ एक तरफ लोग महल पर महल बना रहे हैं वहीं दूसरी और एक शेड भी नसीब में नहीं है| अब भी सरकार सोई हुई है| ऐसे ही कुछ दिनों पहले मध्यप्रदेश की सरकार सोई हुई थी, लेकिन किसानों ने प्रदेश की राजधानी को ही जाम कर दिया तब शायद सरकार को चेतना आयी की इनकी भी कुछ दिक्कतें हैं| यह रीति रही है की जब जब अन्धकार का बोलबाला बढ़ता जाता है लोगों की चेतना जग रही है| अन्धकार से मुक्ति पाने लोग राजा और शासन के खिलाफ गोलबंद होते रहे हैं| अब अगर इस लुट पर लगाम नहीं लगाया गया तो ऐसा न हो की एक और युद्ध छिड जाए| अभी भी समय है जागो और आम के लिए भी कुछ करो| नहीं तो कहा ही गया है की सिंघासन खाली करो की जनता आती है? अगर आप लोगों के चेहरे पर खुशी नहीं ला सकते तो छोड़ तो राजसत्ता| 

Nov 15, 2010

सुदर्शन वाणी?

बयान और भारतीय राजनीति दोनों का चोली-दामन का साथ है| समय-समय पर राजनेता बयान देते रहते हैं, कभी उनका बयान सुर्ख़ियों में आ जाता है तो कभी गुमनामी के अँधेरे में गायब हो जाता है| वैसे भी अगर राजनीतिज्ञ बयान नहीं देंगे तो कौन देगा| अगर बयानों के ताजा श्रृंखला की बात करें तो आरएसएस के पूर्व प्रमुख के एस सुदर्शन के बयान ने देश में हलचल मचा दी है| अजमेर बम धमाके में इन्द्रेश कुमार के लिप्त होने की बात को लेकर देश भर में आरएसएस के लोगों ने धरना दिया था| भोपाल में लिली सिनेमाघर के पास इस धरने में सुदर्शन भी शामिल थे| यही वह भोपाल है जहाँ कुछ दिनों पहले राहुल गाँधी ने इस संगठन की तुलना सिमी से की थी| आखिर जिस जमीन पे राहुल ने आरएसएस की तुलना सिमी से कर दी उस धरती पे कुछ न कुछ तो होना ही था| राहुल के इस बयान के बाद से ही संघ में उबाल था, लेकिन आरएसएस के लोग  राहुल की बात का कोई माकूल जवाब नहीं दे पा रहे थे| आखिर कोई खुलेआम किसी संस्था की साख पर बट्टा लगा रहा है और उसके लोग सिर्फ तमाशा देख रहे हों यह कैसे हो सकता है |  सुदर्शन को राहुल की यह बात अच्छी नहीं लगी, वे समय का इन्तजार करने लगे की कब राहुल को जवाब दिया जाए| और यह समय मिला उन्हें और उन्होंने उसका भरपूर फायदा उठाया| उनके भीतर की ज्वाला भड़क उठी और उन्होंने कह दिया जो कहना था| सुदर्शन ने राहुल पर नहीं उनकी माँ और कांग्रेस की प्रमुख सोनिया गाँधी को निशाना बनाया| सुदर्शन यह सोचते हैं की राहुल जो कुछ कहते हैं वह सोनिया की सलाह होती है ,तो चलो उसी पर निशाना साधो|| सुदर्शन ने सोनिया को अमेरिकी खुफिया संगठन सीआइए का एजेंट कह दिया| सुदर्शन इतने पे ही नहीं रुके उन्होंने राजीव और इंदिरा गाँधी के हत्या में भी सोनिया के शामिल होने की बात कह दी| अगर देश की सबसे बड़ी पार्टी के सर्वेसर्वा के खिलाफ कोई इस तरह की बात कहता है तो उनके चाहने वालों में गुस्सा तो अवश्य  ही होगा| और हुआ भी ऐसा ही, लोगों ने सुदर्शन के खिलाफ लामबंदी शुरू कर दी  |सुदर्शन हर तरह से गलत साबित हो रहे हैं| पूरे देश में उनके खिलाफ धरना और प्रदर्शन हो रहा है| उनपर मुक़दमे की भी बात हो चूकि है| आखिर सुदर्शन ने देश की सबसे ताकतवर महिला के खिलाफ गलत शब्दों का प्रयोग किया है और वह भी बिना किसी प्रमाण के| अगर सुदर्शन प्रमाण के आधार पर ऐसा कहते तो बात कुछ होती, लेकिन आपसी प्रतिशोध में उन्होंने ऐसा कह दिया| उन्हें भरोसा था की बीजेपी और संघ उनके साथ आएगा, लेकिन दोनों ने किनारा कर लिया| खैर बात ही ऐसी है जो हर कोई किनारा करेगा| सुदर्शन ने अपने को प्रचारित करने के चक्कर में फिर से एक ऐसा बयान दे दिया है जो उनके उपर खुद आफत बन गया है| लेकिन मुंह से निकली बात को लौटाया नहीं जा सकता| ऐसा कोई पहली बार नहीं है जब सुदर्शन ने ऐसा कुछ कहा है वो पहले भी ऐसा कह चुके  हैं| उन्होंने तो यह भी कहा था की महात्मा गाँधी को गोली गोडसे ने नहीं किसी और ने मारी थी, लेकिन वहां भी उनके पास प्रमाण की कमी दिखी| मुझे लगता है की सुदर्शन उम्र के साथ नाबोध बालक जैसे हो रहे  हैं जिसे यह ही पता नहीं रहता की क्या कहना है? खैर जो भी हो लेकिन सुदर्शन का अपने को सुर्ख़ियों में लाने का प्रयास विफल हो गया है?  सही कहते हैं न जब विपत्ति में होते हैं तो कोई साथ नहीं देता ऐसा ही कुछ सुदर्शन के साथ भी हो रहा है|  खैर जो भी हो लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है की सुदर्शन का चक्र इस बार नहीं चल सका, वह धरासायी हो गया?

Nov 4, 2010


जिदंगी के हर एक अंत में शायद एक नई शुरुआत की भी संकल्पना छुपी हुई होती है। हमें इसीलिए किसी भी वस्तु के खत्म हो जाने से बहुत ज्यादा दु:खी नहीं होना चाहिए। क्योकि जो चल रहा है, उसे बदलने के लिए एक नई शुरुआत की आवश्यकता होती है। हो सकता है कि नई शुरुआत में कुछ समय लगे और यह जोखिम भरा भी हो। परन्तु आखिरकार डर और जोखिम के बाद ही जीतने का मजा आता है।
राजेश शुक्ल....

Oct 26, 2010

मतदाता की ख़ामोशी?

बहुत दिनों से सोच रहा था की बिहार चुनाव पर कुछ लिखूं| चलिए आज अपना इन्तजार ख़त्म करता हूँ और कुछ लिखता हूँ| इस बार चुनाव हर बार की तरह अलग है, हार दल परेशान है| चाहे वह सत्ता पक्ष हो या विपक्ष हार किसी को हार का डर है| नीतीश कुमार की विकास के नारे जात के नारे में कब के बदल चुकें हैं| सुशील मोदी तो पहले से सुशील हैं, अपने दल में किसी की नहीं सुनते लेकिन नीतीश को अपना आराध्य मान रहें हैं| दूसरी तरफ पुराने राजा लालू जी पूरे परिवार के साथ जुटे हुए हैं, किसी तरह इज्जत बच जाए| रामविलास पासवान के लिए शायद यह आखिरी मौका होगा यह वह भी सोच रहें हैं| कांग्रेस पार्टी भी अपने नए नारों के बीच उछलकूद कर रही है | छोटे बड़े सभी टाल ठोक रहें हैं| निर्दलियों की भरमार है| खुद चुनाव जीतने से उन्हें कोई मतलब नहीं है लेकिन प्रतिद्वंदी को हराना है, ऐसा लेकर वह भी चुनाव मैदान में हैं| लेकिन सबसे निराशाजनक बात है की वोटर खामोश है| शायद उसे किसी पर भरोसा नहीं रह गया है| उसने अभी तक पत्ते नहीं खोले हैं की किसके पक्ष में आंधी है| मतदाता तो हार बार ही छला जाता है, यह उसको भी पता है| इसलिए इसबार उसमे अजीब सी ख़ामोशी है| जनता के तथाकथित सेवकों की हालत पतली है| बिहार चुनाव में ऐसा पहले नहीं होता था, वोटर अपना रुख स्पष्ट करते थे, पिछले लोकसभा और विधानसभा उपचुनाव में भी ऐसा ही हुआ| लेकिन इस बार रहस्य बरकरार है| आखिर वोटर क्या करे सरकार किसी की बने उससे उसको क्या होने वाला है| मंत्री और विधायक कभी कभी ही उनका हाल लेने शायद ही आयेंगे|| वोट की दरकार है तो अभी उनकी भी बारी है हिसाब चुकता करने की| इस बार नीतीश की सभा में भी विरोध इस बार को उजागर करता है की उनके प्रति भी जनता में जबरदस्त गुस्सा है, राहुल गाँधी के प्रति भी ऐसी ही हो चुकी है और भी नेताओं के साथ ऐसा हो चुका है| आप ही बताईये क्या यह वही चुनाव है जहाँ कभी नेतओं के नाम पे ही चुनाव जीत जाते थे आज इतने मसक्कत के बाद भी आशा नहीं है| जरूर इसके लिए हमारे प्रतिनिधि भी जिम्मेदार हैं| धन और शक्ति के नशे में चूर उन्हें आम जनता की कोई सुध- बुध नहीं रहती और वे जनता से दूर होते चले जाते हैं| आज चाँद युवाओं को छोड़कर जयादा को राजनीति में विश्वास नहीं है| मैंने अपने एक दोस्त को फोन किया की इस बार क्या हाल है, उसने मुझे कहा की कुछ नहीं बस सब दौड़ धूप रहें हैं अपने को क्या मतलब| आज अगर एक मतदाता यह कह रहा है तो कुछ जरूर गड़बड़ है| जो कभी चुनाव में बढ़चढ़ कर भाग लेता था आज बेरुखी भरा जवाब देता है| शायद उसको यह विश्वास है की उसको इस चुनाव से कुछ नहीं मिलेगा| और यही बेरुखी नेताओं की परेशानी बना हुआ है| मतदात की ख़ामोशी का कारण वाजिब भी है| आज पार्टियाँ अपराधियों को खुलेआम टिकट दे रही है, तो जनता में खौफ तो होगा ही\ अब तो चुनाव आधा बीत चुका है और कोई भी दल यह नहीं कह रहा है की उसकी जीत हो रही है, लेकिन हार का भय हार किसी को है|  

क्या यह हमारा देश है?

आज फिर से कुछ लिकने की कोशिश कर रहा हूँ, हाथ कीबोर्ड की तरफ खुद ब खुद आ गए| शायद इन्हें भी लग रहा है की आज कुछ लिखना ही चाहिए| तो चलिए जिस्म के इस अंग की बात माननी चाहिए, और शुरुआत करनी चाहिए| विषय आज के तारीख में ढ़ेरों हैं लेकिन आज मैं देश की एक ऐसी स्थिति पे लिखने जा रहा हूँ जो फिलहाल मद्धिम पड़ गया है| आज देश को एक पुनर्जन्म की जरूरत है ऐसे लोगों की जो देश को आजाद करके दुनिया आजाद करने निकल पड़े हैं| आपको लगता होगा की क्या अजीब उल्टी- सीधी बिना मतलब के बात कर रहा है| बड़ा आया है देश की चिंता करने वाला| तो आपको आज मैं अपने तरफ से कुछ कहने की तम्मना रखते हुए ही लिख  रहा हूँ|  जब देश आजाद नहीं हुआ था तो हम सोचते थे की आजादी जल्दी मिले, मिल भी गयी| लेकिन मुझे लगता है देश में ख़ुशी नाम की कोई चीज़ नहीं है, एक तरफ मुकेश अंबानी 27  मंजिला घर बना रहे हैं तो दूसरी तरफ राजू 27  दिनों से बस नाममात्र अन्न पर मौत की बाट जोह रहा है| आप ही बताईये क्या यही  है वह देश जहाँ के लोगों ने आजाद भारत की एक स्वर्णिम कल्पना की थी| आज विजय माल्या का अरबों रुपया बांकी है सरकारी फार्मों में लेकिन उन्हें कोई नोतिसे भी नहीं मिलती, लेकिन बिहार की धन्नो हक़ की बात लेकर बाबुओं के पास जाती है तो उसे फटकार दिया जाता है| आज देश के बड़े बड़े सरकारी समारोह में लाखों रूपये का खाना बर्बाद होता है, तो दूसरी तरफ करोड़ों लोग भूखे पेट सोने को विवश हैं| शायद यही है भारत ऐसा कभी-कभी मैं सोचता हूँ, आज भी किसी दूर दराज के इलाके में जाइये आपको भूख से तिलमिलाते हजारों परिवार मिल जायेंगे| जिनको आँखों में एक आग है, किसी की बाट नहीं सुनते वो, आखिर क्यूँ सुने जब उनकी कोई नहीं सुनता| खुलेआम सरकारी संपत्ति का बंदरबांट चाल रहा है और देश के लोग मूक दर्शक होकर सुन रहे हैं, देख रहे हैं| खुद को विवश कहते हैं, आज भी किसी दफ्तर मैं जाओ तो बिना घूस दिए शायद ही कोई काम होता है| इस बाट को सुप्रीम कोर्ट भी स्वीकार कर चुका है की देश में भ्रष्टाचार गंभीर रूप से व्याप्त  है| सुप्रीम कोर्ट ने व्यंग भरे लहजे में यह भी कहा था की ' बेहतर होगा की सरकार अब रिश्वत खोरी को वैध कर दे , ताकि लोग निश्चित राशि देकर अपना काम करवा ले|' आयकर, बिक्रिकर, अबकारी विभागों में तो कोई काम ही बिना पैसों के नहीं होता| इससे कम से कम प्रत्येक व्यक्ति को यह तो मालूम हो जायेगा की उसे कितना घूस देना है| क्या यह बात यह नहीं कहता की देश में स्थिति किस तरह भयावह है| अब समय आ गया है की हमे कुम्भ्करनी नींद से जागना होगा और खुद के लिए ही नहीं देश के लिए भी कुछ सोचना होगा| मैं आपको एक कहानी सुनाता है जो मेरे साथ घटित हुआ| आज से दो महीने पहले एक आदमी मेरे पास आया (भोपाल में जहाँ मैं फिलहाल जिंदगी गुजर रहा हूँ) उसकी स्थिति से लगती थी की उसने कितने दिनों से ही कुछ खाया नहीं है| वह अचानक मेरे पास आकार बोला साहेब एक बात कहूँ, आप मुझे कुछ रूपये दे दें तो आपका बहुत एहसान होगा| मेरी बेटी एक प्राइवेट हॉस्पिटल में भर्ती है और इलाज के लिए अब पैसे नहीं बचा है| मैंने कहा की सरकारी में क्यूँ नहीं भर्ती करवाया, तो उसका जवाब सुनकर मेरी रूह कांप उठी| उसने कहा की साहेब मेरी बछि तो उसी दिन मर जाती जिस दिन सरकारी में भर्ती करवाता| क्या यही है देश जिसे भारत कहते हैं, जहाँ ओबामा के आंये से पहले करोड़ों रूपये और आने तक पता नहीं कितने रूपये  उनके स्वागत में बहा देता है| लोगों को भूखे मरने दो उसकी फ़िक्र मत करो| शायद यही इंडिया का नारा हो गया है| मुझे लगता है की अगर ये भूखे, नंगे लोग साड़ों पर उतर आयें और कुछ भी करने ओ आतुर रहें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी| और मुझे लगता है की यह कुछ दिनों में हो सकता है| आज भी अगर हम अपने आपसे थोड़ा हट कर दूसरों के लिए भी सोचें तो देश में कितने चेहरों पर मुस्कान आ सकती है| इससे पहले की देश में लोग भूख से बेमौत मरने लगें हमें कुछ करना चाहिए| मेरे हिसाब से यह हमारा भारत नहीं है| यहाँ तो इंडिया घुस आया है, अपनी मौज दूसरों से क्या मतलब| नींद से जागना होगा नहीं तो देर हो जाएगी| मैं आप लोगों से पूछता हूँ क्या यही भारत है? आपके जवाब के आशा में ?