Nov 9, 2013

क्या बदल गया राजद?

राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख राबड़ी देवी ने इस बात छठ लालू कि तस्वीर को सामने रख का मनाया। जाहिर है लालू सजायाफ्ता हैं तो जेल से बाहर तो आ नहीं सकते। और जनता तो आज भी लालू को ही मानती है. एक खास वर्ग में लालू कि जो पहचान है उसको चाह कर भी कोई धुंधला नहीं सकता और आरजेडी उसका फायदा जरुर उठाना चाहेगी। वैसे भी लालू के जेल यात्रा को पार्टी महामंडित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है. पार्टी बबको पूरा भरोसा है कि जनता कि सहानुभूति उनको जरुर मिलेगी। अब जब लालू जेल में हैं तो जाहिर है पार्टी को चलाने के लिए कोई मजबूत कंधा चाहिए। कंधे के रूप में पार्टी ने राबड़ी को चुना। इसके पीछे भी एक बड़ा राज है, लालू कि अनुपस्थिति में पार्टी में बिखराव कि सम्भावना बन सकती थी और अगर तेजस्वी को कमान दी जाती तो कुछ नाराजगी सामने आ सकती थी. लालू ने जो जमीन फिर से तैयार कि थी पार्टी उसका उपयोग करना चाहती थी और लालू नहीं तो राबड़ी को सामने लाकर पार्टी ने अपनी रणनीति जाहिर कर दी. राजद के सामने सबसे बड़ी चुनौती है फिर से सत्ता में वापस आना. जदयू और बीजेपी के गठबंधन के समय राजद कि सम्भावना अच्छी बनती दिख रही थी. कुछ ने कुछ मुद्दे पर जनता सरकार से नाराज थी. सबसे ज्यादा नाराजगी शराब कारोबार नीति और शिक्षक बहाली को लेकर थी. शिक्षकों कि नाराजगी भी नीतीश को झेलनी पड़ी थी और राजद इसका पूरा फायदा उठा रहा था. लेकिन बीजेपी और जदयू के अलगाव ने माहौल बदल दिया लड़ाई अब त्रिकोणीय हो गयी. जदयू नीतीश के भरोसे है तो बीजेपी नमो मंत्र जप रही है तो राजद भावनात्मक माहौल बनाने में लगा है. परिवार को मैदान में उतारकर राजद ने इसका परिचय दे दिया है, साथ ही साथ लालू के जेल जाने को एक षड्यंत्र बताकर भी राजद बाजी अपने पक्ष में करने कि कोशिश में है. पार्टी नेताओं के बीच बिखराव को जिस तरह राजद ने काबू किया है वह आने वाले चुनाव में राजद कि रणनीति को जाहिर करता है. एक नेता और एक वोट के जिस सिद्धांत पर राजद चल रहा है वह आने वाले चुनाव और आगे कि पूरी राजनीति कि तस्वीर दिखाता है. आज लालू भले जेल में हैं लेकिन जनता के बीच आज भी वही हैं. यक़ीनन समय के साथ राजद बदल रहा है. कभी बुरे कारणों से चर्चा में रहने वाले नेता अब आम जन के  हितैषी बनकर रहना पसंद कर रहे हैं. जमीनी स्तर पर जिस तरह नेता मेहनत कर रहे हैं वह राजद के बदले स्वरुप को बयां करता है. कभी तकनीक का मजाक उड़ाने वाले राजद के नेतागण आजकल तकनीक से भी जुड़ रहे हैं, साथ ही साथ राजद अब माय(मुस्लिम+यादव ) समीकरण के अलावे और भी समीकरणों पर ध्यान दे रहा है. इसके पीछे ठाकुर नेताओं का राजद में बढ़ता प्रभुत्व भी एक कारण हो सकता है. राजद कि यह बदली रणनीति आने वाले समय में कितनी कारगर होगी यह तो समय बतायेगा लेकिन इतना तो तय है कि आने वाले समय में राजद पूरी तो नहीं लेकिन थोड़ा बहुत बदला नजर आएगा। आने वाले समय में जनता राजद को राबड़ी या तेजस्वी के रूप में कितना स्वीकार करती है इसका तस्दीक भी हो जायेगा। 

Nov 7, 2013

मोदी बिहार में हैं मुद्दा?

 राजनीतिक रूप से बिहार फिलहाल काफी अलग दिख रहा है. पहले तो नीतीश और बीजेपी का सम्बन्ध विच्छेद उसके बाद लालू का जेल जाना और फिर नरेंद्र मोदी का बिहार आना और उनके पहले ही रैली में बम विस्फोट हो जाना. कभी लालू को सत्ता से बेदखल करने को जदयू और भाजपा ने हाथ मिलाया था और जनता ने भी मौका दिया इस दोस्ती को. दो बार सत्ता में आना कोई हंसी का खेल नहीं है. लेकिन कहते हैं न ऱाजनीति सम्भावनाओं पर चलती है. यहाँ कौन कब दोस्त बन जाये और कौन आँखें तरेर ले कोई नहीं कह सकता. और यह तो सर्वविदित है कि सब दिन एक जैसा नहीं होता. खैर जो भी हो लेकिन बिहार कि राजनीति अचानक इस तरह करवट लेगी किसी को अंदेशा नहीं था. कहते हैं न एक तूफान पूरा परिदृश्य बदल देता है. ऐसा ही कुछ बिहार में भी हुआ. मोदी के नाम पर ऐसी तनातनी हुई कि पूरा खेल ही बदल गया. लालू जो कभी खेल से बाहर थे अचानक जीतने का फार्मूला बनाने लगे. लेकिन तभी एक तूफान और आया और नीतीश और भाजपा अलग हो गए. और फिर शुरू हुआ असली खेल. नीतीश अपना वोट बैंक साधने में लगे थे तो भाजपा अपनी और इनके बीच लालू भी ख़म ठोककर खड़े होने लगे थे. एक तरफ भाजपा नीतीश को औकात दिखाने कि बात करने लगी तो दूसरी ओर नीतीश को कॉंग्रेस का एजेंट बताने में भी भाजपा को मजा आने लगा. वहीं लालू अपनी गोटी फिट करने में लग गए. लालू को जनता का अच्छा सहयोग भी मिलने लगा लेकिन चारा के खेल ने सारा मामला बिगाड़ दिया. लालू जेल चले गए और पूरा मामला एक बार फिर बदल गया. सत्ता के समय जो भाजपा मोदी को बिहार बुलाने में परहेज़ करती थी मोदी अब उसके तारणहार बन चुके थे. मोदी पहले भी मुद्दा थे और फिर मुद्दा बन गए. आखिर वोट बैंक कि राजनीति ही कुछ ऐसी है. हुंकार भरने मोदी पटना आते इससे पहले बम पटना को दहलाने को तैयार था. लेकिन फिर भी मोदी आये और जनता को साधने का हर प्रयास किया. यकीनन गांधी मैदान कि भीड़ ने मोदी और भगवा खेमे को गदगद कर दिया लेकिन भीड़ और वोट में काफी अंतर होता है. नीतीश जहाँ अपने वोट बैंक को लेकर बेफिक्र हैं तो आरजेडी भी वापसी को लेकर काफी उत्साहित है. कांग्रेस फिलहाल अपने को तलाशती दिख रही है. जहाँ राहुल अकेले दम पर चुनाव में जाने कि बात कर रहे हैं वहीं कुछ कांग्रेसी गठबंधन पर भी ध्यान रख रहे हैं. पासवान एक सेतु के रूप में काम करते नजर आ रहे हैं. खैर जो भी हो मुद्दा फिर मोदी ही हैं. वोट बैंक कि राजनीति का मर्म ही कुछ ऐसा है कि जो वोट दिलावे उसी को टारगेट में रख कर चलना चाहिए. पहले भी मोदी के नाम पर वोट मिलते रहे हैं और हो न हो आने वाले समय में भी मिलने लगे तो कोई ताज्जुब नहीं होगा. खैर जो भी हो अब समय का इन्तजार ही सबसे अच्छा विकल्प नजर आ रहा है? 

May 5, 2013

झारखण्ड में बिछ गयी बिसात

राजनीति में बड़ा दम है। यह किसी की तकदीर तो किसी की तस्वीर बदल सकती है। और भारत जैसे देश में तो आमजन के सीधा जुड़ाव इसे और खास बनाता है। कहते हैं राजनीति पल-पल बदलती है। ऊंट की तरह यह किस करवट बैठेगी यह कहना बड़ा दुरूह कार्य है। हमारे देश में अलग-अलग राज्यों की राजनीति अलग-अलग तरह की है और सबको केंद्र साधता है। पहले यह बात जमती थी लेकिन गंठबंधन के इस दौर में यह कहना पूरी तरह से उचित नहीं है। अब राज्य भी शक्तिशाली हो चुके हैं। छत्रप अपने दम पर नीति बनवाते हैं। तो कहने में कोई संकोच नहीं है की राज्य की अनदेखी करना अब शायद सम्भव नहीं है। आज कुछ राज्य तो इतने आगे बढ़ चुके हैं की देश-दुनिया में उनके नाम का बोलबाला है वहीँ दूसरी ओर कुछ राज्य इस कदर रसातल में जा रहे हैं की उसकी चर्चा भी सोचने को विवश कर देती है। हमारे देश में झारखण्ड भी ऐसा ही राज्य है। खनिजों से भरपूर यह राज्य आज हर दृष्टी से पीछे जा रहा है। पूरा देश यहाँ के कोयले से जगमग हो रहा है लेकिन यहाँ सिर्फ कालिख ही है। टाटा का डंका पूरी दुनिया में बजता है लेकिन झारखण्ड में अब वह भी खुश नहीं है। बिहार से अलगाव के बाद यकीन था की यह राज्य प्रगति पथ पर निर्बाध तरीके से गमन करेगा लेकिन अफसोस के सिवा कुछ नहीं रहा इस यकीन में। आखिर क्यूँ हो गया हाल बेहाल झारखण्ड का। लोग कहते हैं की राजनीतिक अस्थिरता ही इसका सबसे बड़ा कारण है। जब सरकार ही अस्थिर हो तो विकास कहाँ से होगा। जहाँ लूट की खुली छूट हो वहां विकास की गंगा कैसे प्रवाहित होगी। बाबूलाल ने शासन में पारदर्शिता लाने की सोची तो सत्ता से ही निकलना पड़ा। अर्जुन ने निशाना लगाया लेकिन स्थानीय महाभारत में वह निशाना लगाने में चूक गए। गुरूजी ने गुरु की भूमिका निभानी चाही लेकिन गुरु के अर्थ को वह समझने में शायद नाकाम रहे। मुंडा ने फिर से माइंड लगाया लेकिन वक्त बदल चूका था। आज फिर से राज्य चुनाव के मुहाने पर आ खड़ा है। चुनाव होने की संभावना प्रबल है। सबकी राह अलग-अलग है। बाबूलाल अकेले दम ठोक रहे हैं, भगवा खुद ही अपने घर में घिरी हुई है, हाथ के साथ लोग कैसे जाएँ यह लोग समझ नहीं पा रहे हैं, सुदेश सीमित हैं और तीर कमान से छुटेगा की नहीं यह कहना कठिन है। चाहे जो भी हो लेकिन जीत झारखण्ड की हो तो बेहतर है। फिलहाल आदिवासी बाहुल्य इस रत्न खंड में पारा जोरों का है। आगाज़ तो हो गया है अब अंदाज देखना है। चलिए आज से झारखण्ड चैप्टर शुरू हो गया है जो चलते रहेगा। आज इजाजत देनी होगी मुलाकात जल्द होगी। 

May 1, 2013

क्या लालू फिर लौटेंगे?

कहते हैं की जब आदमी का पद चला जाता है तो उसकी पूछ कम हो जाती है। कुछ ऐसा ही हो रहा है बिहार के पुराने राजा लालू यादव के साथ। जब सत्ता थी तो ठाट-बाट देखते ही बनती थी। राजा की चलती का अंदाज़ इसी से लगाया जा सकता है की वो अपने मताहतों से तम्बाकू भी बनवाते थे। लेकिन समय ने करवट लिया और सत्ता से राजा जी को उनकी प्रजा ने विमुख करवा दिया। कहते हैं न पब्लिक है ये सब जानती है। सत्ता से दूर जाते ही राजा जी बेचैन होने लगे लेकिन उपाय के नाम पर कुछ नजर ना आने लगा। सुशासन की आंधी  के  आगे पुराने राजा रंक बन गए। लगातार सत्ता की लड़ाई में चोट खानी पड़ी उनको। अब तो उनको लगने लगा की अब पाटलिपुत्र की गद्दी मिलने से रही। इधर छुकछुकिया मंत्रालय भी चला गया एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा। कलेजे पे पत्थर रख राजा जी गुमसुम रहने लगे। धीरे-धीरे कुछ अपने भी किनारा कर गए। सुशासन की धारा में बहने को हर कोई बेताब होने लगा। पुराने राजा अपने टूटते कुनबे को देख बेचैन होने लगे। अब उनको लगा की कुछ करना होगा तभी कुछ होगा। आखिर पुराने हुए तो क्या हुए हैं तो राजा ही, कुछ भी हो जाए पर बात तो वही रहेगी। और ऊपर से ठहरे समाजवादी तो राजा ने संघर्ष की सोची। उनको लगने लगा की बिना धरातल पर उतरे कुछ नहीं होगा। और इधर धीरे-धीरे सुशासन का मंत्र भी फ्लॉप हो रहा था। राजा जी के लिए मौका उपयुक्त था निकल गए रथ लेकर। गांव-गांव, क़स्बा-क़स्बा, शहर-शहर हर जगह रथ दौड़ने लगी। आवाज उठनी शुरू हो गयी। कभी शिक्षकों के साथ खड़े दिखे तो कभी शासन के सताए लोगों के साथ। सर्दी-गर्मी-बरसात की कोई परवाह नहीं निकल पड़े तो निकल पड़े। खूब लोग जुटने लगे सभा में और राजा जी को  तो बोलने में महारत हासिल है ही। खूब उमड़ने लगी भीड़, लगने लगा की राजा जी की बाज़ी लगने वाली है। राजा जी पहली दफा बिल्कुल शांत दिखे। धीरे-धीरे उत्साह बढ़ता गया हर जगह खूब स्वागत किया आवाम ने। राजा जी ने सोचा वक्त मुफीद है और घोषणा कर दी रैला की। आगामी 1 5 मई के लिए  निमंत्रण दे डाला जनता को। लालू के बारे में कहा जाता है की जनता की नब्ज पकड़ने में वह माहिर हैं और उनकी नयी रणनीति भी इसी ओर इशारा कर रही है। लगातार जनता के बीच जाना, मुद्दे उठाना और उनकी राय लेना यह तो रणनीति का ही हिस्सा है। प्रदेश के जानकार कहते हैं की लालू को लग गया है की अभी नहीं तो कभी नहीं और वह इसी के अनुसार चल रहे हैं। और बीजेपी और नीतीश के झगड़े ने उन्हें एक और अस्त्र प्रदान कर दिया है। उनके पास वोट बैंक की कमी नहीं है और अगर कुछ वोट बैंक में सेंध लगाने में वो सफल हो गए तो हो सकता है बाज़ी उनके पक्ष में भी जा सकती है। उनके नेताओं का लगातार आम लोगों के बीच ज्यादा से ज्यादा समय गुजरना इसकी पुष्टि करता है। पुराने साथियों का फिर से उनके साथ आना भी उनके मजबूती को दर्शाता है। अपने पुत्र को राजनीति में उतार कर लालू ने यह संकेत दे दिया है की वो ऐसे ही बिहार को जाने नहीं देंगे। युवाओं को ज्यादा से ज्यादा टिकट देने की बात, सवर्णों के साथ समय देना यह लालू की नयी रणनीति की ही तस्दीक है। जनता भी उनको सुन रही है और जानकारों का कहना है की जनता का साथ जिसको मिले वही असली राजा है।  लालू जिस तरह से हर किसी के साथ दिखने की कोशिश में लगे हैं वह उनके रणनीति का एक अहम् हिस्सा है। शिक्षकों का बिहार के राजनीति में बहुत दखल रहा है और नीतीश को दुबारा सत्ता में लाने में शिक्षकों का बहुत महत्वपूर्ण हाथ रहा है। लेकिन अब गुरूजी ही नाराज हैं तो जाहिर है उनकी नाराजगी तो झेलनी ही पड़ेगी।सत्ता का रास्ता सडकों से होकर ही जाता है और लालू भी अब इसको समझ गए हैं। खैर आने वाला समय ही इसकी असली तस्वीर पेश करेगा लेकिन इतना तय है की इस बार मुकाबला जबरदस्त होगा। 

Apr 29, 2013

चालू हो गया राजनीतिक तमाशा

मौसम गर्मी का है, धूप काफी तेज है। सूरज की प्रचंडता में बदन जला जा रहा है। देश का मिजाज भी गर्म ही है। जब हर तरफ गरमी का एहसास है तो राजनीति कैसे अछूती रहेगी। जनाब राजनीति भी काफी गरम है। इस गरमी का नजारा संसद में देखने को खूब मिल रहा है। लगातार आरोप-प्रत्यारोप का दौर चालू है। अगर गौर करें तो मिशन 2 0 1 4 की तैयारी जोरों पर है। हर दल ख्वाबों में अपने को सत्ता के करीब देख रही है। बड़ी पार्टियों के साथ छोटी पार्टियों को भी लग रहा है की इस बार बिना उनके सहयोग के कोई भी राजा नहीं बन सकता। बिहार, बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु, यूपी  के छत्रप तो मंद-मंद मुस्कुरा रहें हैं की चाहे जो जितना भी गरजे बर्षा तो उनके सहयोग से ही होगी। कोई कोलगेट पे कलह कर रहा है तो कोई कॉमनवेल्थ के सहारे वेल्थ बनाने की जुगत में है। कोई तीर को कमान में लाने को प्रयासरत है तो कोई हाथी मेरे साथी का जुमला उछाल रहा है। कोई अम्मा तो कोई दीदी को मना रहा है तो कोई साइकिल की रफ़्तार के साथ जाने की सोच रहा है। एक तरफ कमल अपना कुनबा बढ़ाने की जद्दोजहद कर रहा है तो एक तरफ हाथ सबके साथ वाली बात करने में व्यस्त है। कहीं बाबा की ब्रांडिंग हो रही है तो कहीं नमो मंत्र का जाप हो रहा है। कोई साधु संतो के शरण में जा रहा है तो कोई युवाओं को साथ लेकर चलने की बात कर रहा है। कोई लैपटॉप तो कोई घर देने की बात कर रहा है। कोई पिछड़े तो कोई अगड़े की रहनुमाई कर रहा है तो कोई माइनॉरिटी संग मोहब्बत बढ़ा रहा है। लेकिन इतना सब होते हुए भी आम आदमी बिल्कुल गायब है। उसको टॉर्च लेकर ढूंढा जा रहा है। तमाशा तो चालू हो चूका है, तमाशबीन पूरे लाव लश्कर के साथ डट चूके हैं तो चलिए हम भी चलें तमाशा देखने।  साथ में कुछ पैसे-वैसे भी लेना मत भूलिएगा कुछ खा-पीकर वापस आएंगे ऐसे थोड़े ही।

Apr 16, 2013

सुशासन बाबू को भगवा का भय?

फिलहाल गर्मियों का मौसम चल रहा है तो जाहिर सी बात है वातावरण तो गर्म होगा ही। मीडिया में भी गर्मी है रोज-रोज बिना मेहनत के मजेदार खबर मिल जा रही है। आने वाला वर्ष चुनाव का वर्ष है तो राजनीतिक गर्मी भी बढ़े तो हमें ताज्जुब नहीं होनी चाहिए। अब देखिए न बिहार का भी वातावरण गर्म हो रहा है जो दिल्ली तक को गरमा रहा है। बोलते हैं नीतीश तो हिलते हैं कई सारे। वैसे भी नीतीश जी को आजकल कुछ ज्यादा ही गर्मी चढ़ी हुई है, लो क्या बकबास बात कर दी मैंने। आखिर लगातार दूसरी बार पाटलिपुत्र की गद्दी मिली है तो सम्राट क्या ठंडा रहेगा। कोई भी आराम से कह सकता है की गद्दी की गरमी बर्दाश्त करनी बहुत मुश्किल होती है। अपने चारा वाले साहेब खूब जानते हैं, क्या मजेदार तरीके से तम्बाकू खाते गरमी झाड़ते थे। आजकल लालटेन किसी तरह एक बार फिर जले इसके लिए तेल का इंतजाम करते फिर रहे हैं। जाने दीजिए जो हुआ सो हुआ अब आते हैं सुशासन बाबू पे। आजकल सुशासन बाबू पूरे गरम हैं बेल का शर्बत और आम की चटनी भी बेअसर है उनके गरमी पर। अपने चचेरे भाई (राजनीतिक) पर रोज -रोज पिनक रहे हैं। अरे भाई ने कह क्या दिया की सिर्फ सुशील ही नहीं अबकी असली मोदी को भी जगह देना होगा। बाप रे बाप एक तो करेला दूजा नीम चढ़ा। आखिर हो बर्दाश्त उनके चलते ही तो सुशासन बाबू की राजनीत अभी तक बची हुई है नहीं तो मुद्दा तो है ही कहाँ। और लालटेन भी टोपी पर दम लगा दिया है तो कुछ तो करना होगा। भूरा बाल तो साथ नहीं ही देगा कम से कम टोपी वाला तो न बिदके। गरमी में बड़ा राहत होता है टोपी से। सुशासन बाबू सोचे की भगवा झंडा को भपकी देंगे तो वह शांत हो जाएगा। सुशील तो वैसे भी सुशील हैं, लेकिन मामला उल्टा पड़ गया। भगवा रंग इस बार पूरा रंगा रहा एक रंग में और सुशासन बाबू को खूब खरी-खोटी सुननी पड़ी। कभी पाटलिपुत्र वाले ने गुस्सा दिखाया तो कभी हस्तिनापुर वाले ने। नतीजा सुशासन बाबू शांति की और जाने लगे। और तो और जब सुशील ने भी अपना रूप दिखाया तो बाबू को लगा की अब तो बिभीषण भी ललकारने लगा। क्या करें, क्या ना करें चलो किसी संघी को ही मलहम लगाया जाए। आखिर बात बनाने में ही फायदा है। सारा भपकी गीदड़ वाला बन गया। पार्टी में तो शरद भी हैं जो गरमी में भी जमे रहना ही पसंद करते हैं। लेकिन इस बार कुछ गरमी उनको भी लगी लेकिन शांत रहना जैसे उनका परम स्वभाव है सो वो उसी पे चलते हैं। सुशासन बाबू ने त्याग-तपस्या वाले को भी मोर्चा पर लगाया लेकिन बात नहीं बनी। अंत में बाबा के शरण में गए लेकिन वो भी जानते हैं भगवा में बाबाओं की कोई कमी नहीं है। वैसे भी मामला तो हम जैसे लोग ही तय करेंगे लेकिन समय-काल और वर्तमान परिस्थिति में सुशासन बाबू जीत से दूर रह गए। और तो और भगवा वाले अब सोच रहें हैं की जब सुशासन की वाहवाही सुशासन बाबू लूटें तो कुशासन का इल्जाम हम क्यूँ सहें। और इन सारी बातों को सोचकर वह भी मन बना रहें हैं की पाटलिपुत्र की सत्ता के अन्दर रह कर बदनामी मोल क्यूँ लिया जाये तो बाहर रह कर भी थोड़ा तमाशा देखा जाए। चलिए अब थोड़ा दरबार घूम लिया जाए कुछ राजकाज की उलटी-सीधी बात जान ली जाए। क्यूँ सही कहा न चलिए देखें क्या हो रहा है?






















Mar 10, 2013

नीतीश का नया पैंतरा?


आगामी 17 मार्च को बिहार की सत्तासीन पार्टी जनता दल यूनाइटेड दिल्ली में राजनीतिक रैली कर रही है। रैली पार्टी अपने लिए बचे आखिरी मुद्दे बिहार को विशेष राज्य का दर्जा को लेकर कर रही है। खूब उगाही जारी है, पार्टी अपने सभी स्टार नेताओं को इस मोर्चे पर लगा चुकी है। बिहार में तो पार्टी ने खूब कमाया अब बारी दिल्ली की है तो मेहनत तो बनती है न। इधर पार्टी की सत्ता सहयोगी बीजेपी ने भी ठान लिया है की मोदी को पीएम पद का प्रत्याशी बनाना ही है। अरे भैया सुशासन बाबू तो दिखावे के लिए मोदी का खूब विरोध करते रहे हैं जबकि हकीकत तो यह है की मोदी ही नीतीश के सबसे बड़े तारणहार हैं। आखिर चुनाव में एक मुद्दा तो बन ही जाते हैं मोदी। लेकिन इस बार बात कुछ उल्टी पड़ गयी है। सुशासन बाबू  का शासन जनता को खुश नहीं रख पा रहा है। अब बात है की आखिर बिहार में ऐसी नौबत कैसे आ गयी जो लोगों का सरकार से भरोसा उठते जा रहा है। भले ही नीतीश के चम्मच गला फाड़ के कहें की विपक्ष एक साजिश कर रहा है लेकिन सही बात यह है की नीतीश गर्त में जा रहे हैं। लोगों ने एक भरोसा जताया था जो कहीं न कहीं टूट रहा है। और सब को पता ही जब-जब किसी शासन ने जनता का भरोसा तोड़ा है जनता ने उसको तोड़ दिया है। बिहार से बाहर लोगों को जरुर लगता है की नीतीश अच्छा कम कर रहे हैं लेकिन हालत दूसरा है। सिर्फ और सिर्फ सत्ता में रहने का तरीका जानते हैं नीतीश और उसी को लेकर चलते हैं। आज के बिहार में किसी चलती है ठेकेदार, माफिया, दलाल और किसका। शायद ही कोई अधिकारी है जो सिर्फ अपने वेतन की कमाई खाता हो। ईमान जहाँ गिरवी रखा जाये वहां क्या कहना। खुली बहस करा लीजिये मामला साफ़ हो जाएगा। किसी भी स्कूल में जाइये बच्चे पढाई क्या करते हैं आपको खुद समझ में आ जायेगा। प्रशासन ठेकेदारों की तरफदारी में लगा है। एक भी ऐसे लोगों की गिनती बता दीजिये जो सही तरीके से काम कर के इस दौरान आगे बढ़ा हो। मायावी दुनिया बाहर से देखने में बहुत शानदार लगती है लेकिन जैसे ही अंदरखाने आईएगा सब नजर आ जायेगा। सड़क बनवाई आपने लेकिन वह भी केंद्र का पैसा था। कहा जाता है की सही शिक्षक एक समाज को बदल सकता है ,बंधु यहाँ तो शिक्षक को गुंडे की तरह दौड़ा-दौड़ा कर पीटा जा रहा है। माफिया की कमाई करोड़ों में और समाज को सही दिशा देने वाले गुरु की औकात सिर्फ कुछ हजार। वह रे शासन और वह रे शासन करने वाले। जिस आशा और विश्वास से जनता ने आपको चुना आपने उसको मिट्टी पलीद कर दिया। मैं या कोई भी बिहारी विकास के विरोधी कैसे हो सकते हैं लेकिन सरकार को लगता है की हम ऐसे हैं। मैं आजकल बिहार में हूँ और सारी चीजें पाने नग्न आँखों से देख रहा हूँ मैं तो विश्वास के साथ कहता हूँ इसे विकास कतई नहीं कहते हैं। अखबारों को तो आपने खरीद लिया है कम से कम अपने ईमान  को भी बरक़रार रखिये। पत्रकार बिहार में खुश हैं की जेपी के इस चेले के राज में खूब मटन-चिकेन हो रहा है। पुराने से लेकर नए सभी लुत्फ़ उठा रहे हैं और जो इससे बाहर हैं उनको शायद ही कोई पूछ रहा है। बिहार विकास करे यह सभी बिहारी चाहते हैं। जो भी हो यह तो कहा ही जा सकता है की जब गुंडे शासन में हों तो फिर किसपे करें यकीं। बहुतों को हो सकता है यह बात चुभे लेकिन दोस्त हकीकत को जरुर समझने की छोटी सी भूल कीजिये। बस बिहार हर तरह से खुशहाल हो।