We all should support Raj Thackeray and take his initiative ahead by doing
more..
1. We should teach our kids that if he is second in class, don't study
harder.. just beat up the student coming first and throw him out of the
school
2. Parliament should have only Delhiites as it is located in Delhi
3. Prime-minister, president and all other leaders should only be from Delhi
4. No Hindi movie should be made in Bombay . Only Marathi.
5. At every state border, buses, trains, flights should be stopped and staff
changed to local men
6. All Maharashtrians working abroad or in other states should be sent back
as they are SNATCHING employment from Locals
7. Lord Shiv, Ganesha and Parvati should not be worshiped in our state as
they belong to north ( Himalayas )
8. Visits to Taj Mahal should be restricted to people.
Dec 1, 2009
Nov 29, 2009
सिनेमाहाल या युद्ध का मैदान
बहुत दिनों के बाद आप सबो से मुलाकात हो रही है तो और कहे कैसे है .और आज कुछ लिखने जा रहा हूँ .मैं जिस विषय पे आज कुछ ज्ञान पखारने जा रहा हूँ वो है आज के समय में सिनेमाहाल .आज तो लोग माल्स में ही सिनेमा देखने जाते है बड़े शहरों में तो करीब करीब लेकिन अगर मैं बताऊँ तो सिनेमाहाल में बैठ कर सिनेमा देखने का मज़ा ही कुछ और है ,लोगो की भीड़ ,उस भीड़ में टिकेट के लिए मारामारी ,टिकेट मिलने के बाद भी सीट मिलने की कोई गारंटी नही जो पहले घुस गया उसी को सीट मिलेगी .फिर मारामारी सिनेमा हाल में मौजूद लोगो को शांत करानेमें खैर मारामारी सिनेमाहाल में घुसने से लेकर निकलने तक ये कहाँ नसीब में माल्स और बड़े मल्टीप्लेक्स में इसी को तो कहते है सिनेमा विथ देशी सिस्टम .तो मुझे लगता है अब तक आप कुछ न कुछ तो समझ ही गए होंगे की काहे लोगो की भीड़ सिनेमाहाल से दूर होती जा रही है पर छोटे शहरों में इनका जादू अभी भी बरकरार है ,जनाब तो आपको तो समझ आ ही गया होगा की आख़िर क्या हाल है सिनेमहाल्स का ?
Nov 11, 2009
भटकाव
जिंदगी में बहुत चीज़ हमें ऐसे भी समय में सीखने को मिल जाती है जिसकी हम कल्पना भी नही करते है .मैंने भी अपने अ़ब तक के अल्प जीवन में बहुत कुछ इसी तरह से सिखा है .ऐसे तो मैं किसी बड़े शहर से नहींआता हूँ और कभी कभी लगता भी है की काश मैं भी किसी बड़े शहर से आता लेकिन जिस तरह पुरबा हवा का झोखा बस छु कर निकल जाता है उसी तरह ये ख्याल भी जल्द ही छूमंतर हो जाता है .एक तरह से कहूँ तो मैं अपने आपको धन्य मानता हूँ की मुझे ग्रामीण और शहरी दोनो जीवन जीने का मौका मिला है.अब मैं जो कुछ भी कहना चाहता हूँ वो ये क्या की अगर आपने अपना कुछ समय गावं में नहीं बिताया है तो आप भारत देश के विषय में ज्यादा नहीं कह सकते है जैसे की मैंने बहुत सारे लिखने वालो को पढ़ा तो मुझे बहुत सी बातें अजीब सी लगी लेकिन एक पल ही ये समझते देर नहीं लगी की इन्होने तप सिर्फ़ औरो से जो सुना है वही लिखा है वास्तविकता तो कोसो दूर लगती है इनके लेखनी से .मैं जो मुझे लग रहा है वो ये क्या की अपने मुद्दे से भटक रहा हूँ ,मैंने जो शुरुआत की थी वो कुछ और थी पर क्या करू भटक जाता हूँ ऐसी दुनिया में आकर .
Oct 21, 2009
क्या कहूँ
यात्रा को अगर शब्दों में लिखने को कहा जाए तो एक बार तो लगता है क्या लिखू कहाँ से शुरुआत करूँ पर कुछ तो करना पड़ेगा चलिए कुछ लिखते है .मैंने अभी हाल में ही रुद्रपुर की यात्रा की है मिला जुला हुआ ही रहा ,चाचा की इस दुनिया को अलविदा कहने की ख़बर पहले ही मिल चुकी थी ,उत्साह हाफ हो गया था .खैर फिर भी उनके आखिरी संस्कार में समय से पहुँच नही पता तो पुराने प्रोग्राम पर ही चल पड़ा .बस पॉँच घंटे की यात्रा थी ,सोचा यूँ ही कट जायेगी पर हुआ ऐसा कुछ भी नही जो हुआ मैं लिख रहा हु .अगर सही लिखूं तो एक बात जरूर कहना चाहूँगा की अगर आपके बगल में कोई लड़की बैठी है तो बड़ा गजब सा माहौल हो जाता है ,मेरा सीट भी कुछ इसी तरह पड़ा आप इसे सौभाग्य कहिये लेकिन मैं इसे दुर्भाग्य ही मानता हु ,मैं समझता हूँ की इससे आजादी में कुछ कमी आ जाती है खैर हटायिए जो भी हो .मैंने एक बात जो आज तक अनुभव की है की अगर आप किसी लड़की के बगल में बैठे है और वो आपके बगल में तो प्रतिक्रिया के बारे में दोनों सोचते है ,आपको अब तक लग गया होगा की आज मैं पुरे रंग मैं हूँ पर हाँ मैं आपको बता दू की ये वो बात नही है जैसा की आप अब तक समझ रहे है .मैं तो सिर्फ़ ये बता रहा हु की आख़िर होता क्या है ?मैं विण्डो सीट पर था आख़िर सीट बुक थी मेरे नाम ,हकदार था मैं पर क्या बताऊ क्या हुआ ,मैं थोडी देर तक तो अपने जगह पर ही बैठा रहा लेकिन उसके बाद क्या हुआ होगा आप सोच चुके होंगे ,वही जो होता है एक हलकी सी बात और जगह फिर दुसरे के पास ,पर मैं औरतो को सीट दे दिया करता हु लेकिन आज लड़की को भी दे दिया ,बस फिर क्या मैं इधर मेरे उसके बीच उसके पापा फिर मैं ?मैं बहुत देर तक यही सोच रहा था की मैंने उसे सीट आख़िर इस तरह दे दिया पर अब तो जो होना था वो हो चुका था ,बस मैंने उस को वही भूल कर अलग काम में लग गया पर वो नही भूल सका ?एक बात मैंने जो मैंने जानी वो ये क्या की कैसे मन badalta है ?
Oct 15, 2009
अटपटी सोच
शहर की मारामारी और हम शायद हर किसी को अटपटा सा लग...
शहर की मारामारी और हम शायद हर किसी को अटपटा सा लग रहा होगा की मैं इस पर क्या बकवास लिख रहा हु , या मैं जो भी लिखना चाह रहा हूँ उसका मतलब क्या कुछ है .कुछ खटपट तो जरूर है जिसने मुझे लिखने को मजबूर किया है या हो सकता है मुझे कुछ ऐसा दिखा हो जो की लिखने लायक हो .पर बात अगर मैं कहूँ की ऐसी वैसी नही तो थोड़ा अचरज तो जरूर होगा .खैर मैं फिलहाल नॉएडा में वास कर रहा हूँ एक छोटा सा कमरा है जिसमे जिंदगी के साँस को अन्दर बाहर करता हूँ ,आखिर जरूरी है करना ही पड़ेगा नही तो इस पर लिखूंगा कैसे .खैर जाने दीजिये इन बातो को ये तो टेंशन में आदमी ऐसे ही लिखता रहता है .अब थोडी काम की बात हो जाए अरे पर यहाँ तो मुझे कुछ काम ही नही है ,सुबह उठ कर नहाना ,फिर कॉलेज जन नेट परसमय देना ,एक से एक खतरनाक क्लास करना यही तो है फिलहाल जिंदगी ,पर हाँ एक चीज़ है जो मुझे सोचने को कुछ देर तक विवश करता है वो तब जब मैं बस में सफर करता हूँ .उतनी भीड़ एक दुसरे के उपर आने को आतुर ,खैर बस है तो भीड़ तो होनी ही चाहिए नही तो काम नही चलेगा .मैं सोचता हु की यहाँ की जिंदगी क्या है क्या सोच कर महानगर में लोग आते है जिंदगी बिताने को वो बिता तो रहे है पर जो कल तक गावं में एक दूजे के लिए था वो अब अपने के लिए हो गया .यहाँ आने के बाद भूल जाते है लोग मानवता ,भाईचारा ,बंधुत्व और कितने उपमे से अलंकृत करू शायद कम पड़ जाए .मैं देखता हु की यहाँ जिंदगी है शाम या रात को घर आओ फिर खाना बनाओ फिर खाओ और फिर सुबह उठो और काम पर जाओ .फुरसत मांगे भी नही मिलती अरे कंपनी में और भी समय देना है पैसे की खातिर चाहए कुछ भी हो जाए देश फिर भी गरीबी में ही है .कहाँ से उपाय करे ,अरे मैं तो लग रहा है भटक गया मुद्दे से अरे यही तो होता है हर के साथ यहाँ ?
शहर की मारामारी और हम शायद हर किसी को अटपटा सा लग रहा होगा की मैं इस पर क्या बकवास लिख रहा हु , या मैं जो भी लिखना चाह रहा हूँ उसका मतलब क्या कुछ है .कुछ खटपट तो जरूर है जिसने मुझे लिखने को मजबूर किया है या हो सकता है मुझे कुछ ऐसा दिखा हो जो की लिखने लायक हो .पर बात अगर मैं कहूँ की ऐसी वैसी नही तो थोड़ा अचरज तो जरूर होगा .खैर मैं फिलहाल नॉएडा में वास कर रहा हूँ एक छोटा सा कमरा है जिसमे जिंदगी के साँस को अन्दर बाहर करता हूँ ,आखिर जरूरी है करना ही पड़ेगा नही तो इस पर लिखूंगा कैसे .खैर जाने दीजिये इन बातो को ये तो टेंशन में आदमी ऐसे ही लिखता रहता है .अब थोडी काम की बात हो जाए अरे पर यहाँ तो मुझे कुछ काम ही नही है ,सुबह उठ कर नहाना ,फिर कॉलेज जन नेट परसमय देना ,एक से एक खतरनाक क्लास करना यही तो है फिलहाल जिंदगी ,पर हाँ एक चीज़ है जो मुझे सोचने को कुछ देर तक विवश करता है वो तब जब मैं बस में सफर करता हूँ .उतनी भीड़ एक दुसरे के उपर आने को आतुर ,खैर बस है तो भीड़ तो होनी ही चाहिए नही तो काम नही चलेगा .मैं सोचता हु की यहाँ की जिंदगी क्या है क्या सोच कर महानगर में लोग आते है जिंदगी बिताने को वो बिता तो रहे है पर जो कल तक गावं में एक दूजे के लिए था वो अब अपने के लिए हो गया .यहाँ आने के बाद भूल जाते है लोग मानवता ,भाईचारा ,बंधुत्व और कितने उपमे से अलंकृत करू शायद कम पड़ जाए .मैं देखता हु की यहाँ जिंदगी है शाम या रात को घर आओ फिर खाना बनाओ फिर खाओ और फिर सुबह उठो और काम पर जाओ .फुरसत मांगे भी नही मिलती अरे कंपनी में और भी समय देना है पैसे की खातिर चाहए कुछ भी हो जाए देश फिर भी गरीबी में ही है .कहाँ से उपाय करे ,अरे मैं तो लग रहा है भटक गया मुद्दे से अरे यही तो होता है हर के साथ यहाँ ?
Oct 13, 2009
लोग कहते है की अगर आप किसी की मदद करते हो तो कोई न कोई किसी न किसी तरह ,जिंदगी में कभी न कभी आपकी मदद किसी न किसी रूप में कर ही देता है.खैर जो भी हो मैं जहाँ तक सोचता हु तो ये बात मेरे हिसाब से सही है .मेरे निज के साथ तो ऐसा कोई मौका नही आया है पर मैंने लोगो की अपने तरीके से कुछ न कुछ मदद करने की कोशिस की है ,मतलब जहाँ तक मुझे लगा है तो मैं बस कहना चाहता हु की अगर किसी की भी मदद कर सकते तो मेरे तरीके के अनुसार करना चाहिए .मैं यहाँ पर एक और बात करना चाह रहा हु की अगर हम किसी की जरूरत को किसी भी हद तक समझ सकते है और उसे कुछ दूर कर सकते है तो जरूर करना चाहिये .एक घटना का मैं यहाँ विशेष तौर पे जिक्र करना चाहता हु .मैं इस बार होली पे पठानकोट गया था .खैर जिस घटना के बारे में कहना चाह रहा हु वो ये क्या मैं जब वापस आ रहा था तो मैंने जनरल क्लास में यात्रा करने की सोची .भीड़ जबरदस्त थी और किसी तरह बस पैर रखने की थोडी सी जगह थी .मैं ट्रेन में सवार तो हो गया पर मैंने देखा की लोग परेशान है.मैंने अपने साथ कुछ खाने की भी चीज़ ले ली थी .मगर जो मेरे साथ हुआ वो मैं कभी नही भूल पाऊंगा . एक बुढा आदमी कुछ बडबडा रहा था मैंने जानने की कोशिस करने लगा तो मुझे पता लगा की वो तीन दिनों से भूखा था .मुझे लगा की ये भूख से गुस्सा रहा था मैंने उनसे कहा की मेरे पास कुछ है उसने बिना कुछ सोचे अपने कहा बड़ी जोर से भूख लगी है .मेरे पास जो भी था मैंने उन्हें दे दिया वो बस खाने लगा .मैं उसे देखता रहा और बस एक चीज़ मेरे मन में आ रहा था की क्या है दुनिया ?और क्या होती है भूख ?खाने के बाद मैंने देखा की उनके मुख पर एक जो भाव था वो सायद मुझे कुछ न कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया ?मैंने देख लिया की दुनिया में अगर किसी की मदद की जाए तो उसके बाद जो एक शकुन मिलता है वो मैंने उसके बाद समझ लिया ?
Oct 12, 2009
मध्यप्रदेश में नया फार्मूला
मध्यप्रदेश में अब मंत्री और ऑफिसर प्रतिदिन डायरी लिखेंगे ,इस डायरी में जो मुख्या बात होगी वो ये क्या की वो प्रतिदिन किससे मिलते है ?कौन से सरकारी काम निबटाते है इन सब चीजों को लेकर होगी .सबसे जो मुख्य बात है वो ये क्या की मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का मानना है की इससे सारी जानकारी मिल सकेगी की कौन से काम समय पे पुरा हुआ या नही हुआ .इसके द्वारा जो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की एक सोच की इससे लोगो में सरकार की लोकप्रियता भी बढेगी ,लोगो को सरकार से जुड़े मामले में सच्चाई नज़र आएगी .इस के परिणाम स्वरुप लोगो की समस्स्याओ को ज्यादा अच्छे से निपटाया भी जाया जाय सकेगा .इस में अधिकारी लोगो के वास्ते जो नियम है वो है की उन्हें इसमे प्रतिदिन का एक तरह से हिसाब ही देना होगा .अधिकारियो को ये बताना होगा की उन्होंने महीने में क्या क्या काम किया और उसमे आवश्यक कितने थे .अपने विभाग को लेकर कितने महत्वपूर्ण फैसले लिया .एक बात तो जरूर है की इस कदम की प्रशंसा तो करनी ही चाहए की कम से कम सरकार के मुखिया ने येः तो सोचा की कैसे प्रशासन को ज्यादा पारदर्शक बनाया जाय। .वही दूसरी ओर मंत्रियो को भी हर महीने अपने काम के बारे में जानकारी देनी होंगी .अपने प्रभार वाले जिले के दौरे की भी जानकारी देनी होंगी .साथ ही साथ येः भी बताना होगा की अपने मंत्रालय में कितना समय दे रहे है .अधिकारियो की रिपोर्ट तो हर महीने १५ तारीख को वेबसाइट पे होगी पैर मंत्रियो की रिपोर्ट को सिर्फ़ मुख्मंत्री ही पढेंगे .मेरा मानना है की सरकार को लोकसभा के परिणामो ने इस चीज़ को करने को उकसाया जैसा की चुनाव परिणाम ने जता दिया की सरकार से जनता उतनी खुस नही है .खैर जो भी हो येः कदम स्वागत के योग्य है .
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