Dec 4, 2009
कांग्रेस की बिहार स्थिति
कांग्रेस पार्टी द्वारा राज्यों में जल्द ही पार्टी संगठन के चुनाव कराने जाने के आसार है ,पार्टी का अगला लक्ष्य उत्तरप्रदेश में २०१२ का विधानसभा और बिहार में २०१० के विधानसभा चुनावों पर है ,उत्तरप्रदेश में तो पार्टी को कुछ सफलता भी इस लोकसभा चुनाव के दौरान मिली थी लेकिन बिहार में अपने पुराने सहयोगियों से अलग होकर ख़ुद चुनाव लड़ना पार्टी के लिए कोई खास कामयाबी भरा नहीं रहा .पार्टी की स्थिति बिहार में कुछ अच्छे नहीं है ,यहाँ पार्टी में ऐसा कोई नेता नहीं है जो कम से कम पांच सीट भी जिताने की कुव्वत रखता हो .ख़ुद पार्टी के प्रदेश प्रमुख जगदीश शर्मा का वोटरों पर तो जाने ही दीजिये अपनी पार्टी के लोगो पर ही कोई खास नियंत्रण नहीं है .पार्टी की स्थिति एक तरह से कहा जाए तो अभी असमंजस वाली ही है की अगले चुनाव में क्या ख़ुद अकेले ही लड़ा जाए या फिर किसी से गठबंधन कर के ?पार्टी के कई नेता तो गठबंधन के फिराक में है लेकिन आलाकमान के कड़े रुख के सामने कोई कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं कर रहा है .पिछले लोकसभा में पार्टी को महज २ सीट ही मिल सका जो पिछली बार ४ था .पार्टी ने एक चीज़ जो बिहार में पायी वो ये क्या की उसके पुराने वोटर धीरे धीरे उसका साथ पकड़ रहे है ,लेकिन पार्टी को कोई खेवनहार नहीं मिल रहा है जो उसका पारघाट लगा सके ,.
Dec 1, 2009
घाटा किसका
सांसदों का सदन से गायब रहना कोई नई बात नही है ,अरे आख़िर जनता के प्रतिनिधि है जनता को भी समय तो देना ही है और संसद में उपस्थित रह कर तो चुनाव नही ही जीता जा सकता है ये तो हुआ एक मामला .अब चलये दूसरी तरफ़ भी निगाह डालते है .कल यानि की बिता हुआ ३० नोवंवर को जो हुआ वो एक नया तो नही लेकिन जबरदस्त झलक थी की कितने हिमायती है हमारे सांसद हमारे लिए उनके लिए हमसे नजदीकी कितना जरूरी है उस चीज़ का शानदार परिचय दिया है इन लोगो ने .संसद में प्रश्नकाल के दौरान कुछ प्रश्न पूछे जाते है ,हर किसी का दिन सुनिश्चित रहता है इसके लिए फिर भी वो इस दिन अनुपस्थित रहते है , कल भी लगभग १७ विषयो पर प्रश्न पूछा जाना था लेकिन जो हुआ वह एक तरह से अलग ही वाकया था ,लगभग ३२ सांसद आनुपस्थित रहे स्पीकर नाम पुकारते रहे पर कोई रहता तो न जबाब देता कोई था ही नही .कई लोगो ने अनुपस्थिति का कारण यात्रा में देरी को बताया तो कई लोगो का जबाब था की बकरीद मिलन के कारण कार्यक्रम था इसलिए देर हो गया .लेकिन अगर एक बात पर गौर करे तो इसमे नुकसान तो आम लोगो का ही हुआ ,संसद को चलाने में प्रतिदिन करोड़ो रूपये खर्च होते है और वो होता है आम जनता का तो बात तो बराबर है नुकसान तो आम लोगो का ही हुआ .दूसरी बात हर सांसद अपने प्रश्न में अपने इलाके की समस्या को जरूर उठाता है और उठाये भी कैसे नही आख़िर जनता को जबाब भी तो देना है सरकार का धयान भी तो दिलाना है अपने इलाके की तरफ़ तो ऐसे में अगर सांसद ही अनुपस्थित रहे तो सवाल कौन उठाएगा घाटा तो जनता का ही है .देश में हर लोगो को सही से खाने और रहने की सुविधा नही है और वो इसकेलिए अपने जनप्रतिनिधि पर आश्रित रहते है की वो उन्हें ये चीज़े मुहैया कराएँगे पर यहाँ तो हालत ऐसे है आख़िर क्या होगा हमारे देश का .ये सवाल हर उस लोगो को सोचना चाहए जो इस व्यवस्था से तालूकात रखते है .
letter to common people
We all should support Raj Thackeray and take his initiative ahead by doing
more..
1. We should teach our kids that if he is second in class, don't study
harder.. just beat up the student coming first and throw him out of the
school
2. Parliament should have only Delhiites as it is located in Delhi
3. Prime-minister, president and all other leaders should only be from Delhi
4. No Hindi movie should be made in Bombay . Only Marathi.
5. At every state border, buses, trains, flights should be stopped and staff
changed to local men
6. All Maharashtrians working abroad or in other states should be sent back
as they are SNATCHING employment from Locals
7. Lord Shiv, Ganesha and Parvati should not be worshiped in our state as
they belong to north ( Himalayas )
8. Visits to Taj Mahal should be restricted to people.
more..
1. We should teach our kids that if he is second in class, don't study
harder.. just beat up the student coming first and throw him out of the
school
2. Parliament should have only Delhiites as it is located in Delhi
3. Prime-minister, president and all other leaders should only be from Delhi
4. No Hindi movie should be made in Bombay . Only Marathi.
5. At every state border, buses, trains, flights should be stopped and staff
changed to local men
6. All Maharashtrians working abroad or in other states should be sent back
as they are SNATCHING employment from Locals
7. Lord Shiv, Ganesha and Parvati should not be worshiped in our state as
they belong to north ( Himalayas )
8. Visits to Taj Mahal should be restricted to people.
Nov 29, 2009
सिनेमाहाल या युद्ध का मैदान
बहुत दिनों के बाद आप सबो से मुलाकात हो रही है तो और कहे कैसे है .और आज कुछ लिखने जा रहा हूँ .मैं जिस विषय पे आज कुछ ज्ञान पखारने जा रहा हूँ वो है आज के समय में सिनेमाहाल .आज तो लोग माल्स में ही सिनेमा देखने जाते है बड़े शहरों में तो करीब करीब लेकिन अगर मैं बताऊँ तो सिनेमाहाल में बैठ कर सिनेमा देखने का मज़ा ही कुछ और है ,लोगो की भीड़ ,उस भीड़ में टिकेट के लिए मारामारी ,टिकेट मिलने के बाद भी सीट मिलने की कोई गारंटी नही जो पहले घुस गया उसी को सीट मिलेगी .फिर मारामारी सिनेमा हाल में मौजूद लोगो को शांत करानेमें खैर मारामारी सिनेमाहाल में घुसने से लेकर निकलने तक ये कहाँ नसीब में माल्स और बड़े मल्टीप्लेक्स में इसी को तो कहते है सिनेमा विथ देशी सिस्टम .तो मुझे लगता है अब तक आप कुछ न कुछ तो समझ ही गए होंगे की काहे लोगो की भीड़ सिनेमाहाल से दूर होती जा रही है पर छोटे शहरों में इनका जादू अभी भी बरकरार है ,जनाब तो आपको तो समझ आ ही गया होगा की आख़िर क्या हाल है सिनेमहाल्स का ?
Nov 11, 2009
भटकाव
जिंदगी में बहुत चीज़ हमें ऐसे भी समय में सीखने को मिल जाती है जिसकी हम कल्पना भी नही करते है .मैंने भी अपने अ़ब तक के अल्प जीवन में बहुत कुछ इसी तरह से सिखा है .ऐसे तो मैं किसी बड़े शहर से नहींआता हूँ और कभी कभी लगता भी है की काश मैं भी किसी बड़े शहर से आता लेकिन जिस तरह पुरबा हवा का झोखा बस छु कर निकल जाता है उसी तरह ये ख्याल भी जल्द ही छूमंतर हो जाता है .एक तरह से कहूँ तो मैं अपने आपको धन्य मानता हूँ की मुझे ग्रामीण और शहरी दोनो जीवन जीने का मौका मिला है.अब मैं जो कुछ भी कहना चाहता हूँ वो ये क्या की अगर आपने अपना कुछ समय गावं में नहीं बिताया है तो आप भारत देश के विषय में ज्यादा नहीं कह सकते है जैसे की मैंने बहुत सारे लिखने वालो को पढ़ा तो मुझे बहुत सी बातें अजीब सी लगी लेकिन एक पल ही ये समझते देर नहीं लगी की इन्होने तप सिर्फ़ औरो से जो सुना है वही लिखा है वास्तविकता तो कोसो दूर लगती है इनके लेखनी से .मैं जो मुझे लग रहा है वो ये क्या की अपने मुद्दे से भटक रहा हूँ ,मैंने जो शुरुआत की थी वो कुछ और थी पर क्या करू भटक जाता हूँ ऐसी दुनिया में आकर .
Oct 21, 2009
क्या कहूँ
यात्रा को अगर शब्दों में लिखने को कहा जाए तो एक बार तो लगता है क्या लिखू कहाँ से शुरुआत करूँ पर कुछ तो करना पड़ेगा चलिए कुछ लिखते है .मैंने अभी हाल में ही रुद्रपुर की यात्रा की है मिला जुला हुआ ही रहा ,चाचा की इस दुनिया को अलविदा कहने की ख़बर पहले ही मिल चुकी थी ,उत्साह हाफ हो गया था .खैर फिर भी उनके आखिरी संस्कार में समय से पहुँच नही पता तो पुराने प्रोग्राम पर ही चल पड़ा .बस पॉँच घंटे की यात्रा थी ,सोचा यूँ ही कट जायेगी पर हुआ ऐसा कुछ भी नही जो हुआ मैं लिख रहा हु .अगर सही लिखूं तो एक बात जरूर कहना चाहूँगा की अगर आपके बगल में कोई लड़की बैठी है तो बड़ा गजब सा माहौल हो जाता है ,मेरा सीट भी कुछ इसी तरह पड़ा आप इसे सौभाग्य कहिये लेकिन मैं इसे दुर्भाग्य ही मानता हु ,मैं समझता हूँ की इससे आजादी में कुछ कमी आ जाती है खैर हटायिए जो भी हो .मैंने एक बात जो आज तक अनुभव की है की अगर आप किसी लड़की के बगल में बैठे है और वो आपके बगल में तो प्रतिक्रिया के बारे में दोनों सोचते है ,आपको अब तक लग गया होगा की आज मैं पुरे रंग मैं हूँ पर हाँ मैं आपको बता दू की ये वो बात नही है जैसा की आप अब तक समझ रहे है .मैं तो सिर्फ़ ये बता रहा हु की आख़िर होता क्या है ?मैं विण्डो सीट पर था आख़िर सीट बुक थी मेरे नाम ,हकदार था मैं पर क्या बताऊ क्या हुआ ,मैं थोडी देर तक तो अपने जगह पर ही बैठा रहा लेकिन उसके बाद क्या हुआ होगा आप सोच चुके होंगे ,वही जो होता है एक हलकी सी बात और जगह फिर दुसरे के पास ,पर मैं औरतो को सीट दे दिया करता हु लेकिन आज लड़की को भी दे दिया ,बस फिर क्या मैं इधर मेरे उसके बीच उसके पापा फिर मैं ?मैं बहुत देर तक यही सोच रहा था की मैंने उसे सीट आख़िर इस तरह दे दिया पर अब तो जो होना था वो हो चुका था ,बस मैंने उस को वही भूल कर अलग काम में लग गया पर वो नही भूल सका ?एक बात मैंने जो मैंने जानी वो ये क्या की कैसे मन badalta है ?
Oct 15, 2009
अटपटी सोच
शहर की मारामारी और हम शायद हर किसी को अटपटा सा लग...
शहर की मारामारी और हम शायद हर किसी को अटपटा सा लग रहा होगा की मैं इस पर क्या बकवास लिख रहा हु , या मैं जो भी लिखना चाह रहा हूँ उसका मतलब क्या कुछ है .कुछ खटपट तो जरूर है जिसने मुझे लिखने को मजबूर किया है या हो सकता है मुझे कुछ ऐसा दिखा हो जो की लिखने लायक हो .पर बात अगर मैं कहूँ की ऐसी वैसी नही तो थोड़ा अचरज तो जरूर होगा .खैर मैं फिलहाल नॉएडा में वास कर रहा हूँ एक छोटा सा कमरा है जिसमे जिंदगी के साँस को अन्दर बाहर करता हूँ ,आखिर जरूरी है करना ही पड़ेगा नही तो इस पर लिखूंगा कैसे .खैर जाने दीजिये इन बातो को ये तो टेंशन में आदमी ऐसे ही लिखता रहता है .अब थोडी काम की बात हो जाए अरे पर यहाँ तो मुझे कुछ काम ही नही है ,सुबह उठ कर नहाना ,फिर कॉलेज जन नेट परसमय देना ,एक से एक खतरनाक क्लास करना यही तो है फिलहाल जिंदगी ,पर हाँ एक चीज़ है जो मुझे सोचने को कुछ देर तक विवश करता है वो तब जब मैं बस में सफर करता हूँ .उतनी भीड़ एक दुसरे के उपर आने को आतुर ,खैर बस है तो भीड़ तो होनी ही चाहिए नही तो काम नही चलेगा .मैं सोचता हु की यहाँ की जिंदगी क्या है क्या सोच कर महानगर में लोग आते है जिंदगी बिताने को वो बिता तो रहे है पर जो कल तक गावं में एक दूजे के लिए था वो अब अपने के लिए हो गया .यहाँ आने के बाद भूल जाते है लोग मानवता ,भाईचारा ,बंधुत्व और कितने उपमे से अलंकृत करू शायद कम पड़ जाए .मैं देखता हु की यहाँ जिंदगी है शाम या रात को घर आओ फिर खाना बनाओ फिर खाओ और फिर सुबह उठो और काम पर जाओ .फुरसत मांगे भी नही मिलती अरे कंपनी में और भी समय देना है पैसे की खातिर चाहए कुछ भी हो जाए देश फिर भी गरीबी में ही है .कहाँ से उपाय करे ,अरे मैं तो लग रहा है भटक गया मुद्दे से अरे यही तो होता है हर के साथ यहाँ ?
शहर की मारामारी और हम शायद हर किसी को अटपटा सा लग रहा होगा की मैं इस पर क्या बकवास लिख रहा हु , या मैं जो भी लिखना चाह रहा हूँ उसका मतलब क्या कुछ है .कुछ खटपट तो जरूर है जिसने मुझे लिखने को मजबूर किया है या हो सकता है मुझे कुछ ऐसा दिखा हो जो की लिखने लायक हो .पर बात अगर मैं कहूँ की ऐसी वैसी नही तो थोड़ा अचरज तो जरूर होगा .खैर मैं फिलहाल नॉएडा में वास कर रहा हूँ एक छोटा सा कमरा है जिसमे जिंदगी के साँस को अन्दर बाहर करता हूँ ,आखिर जरूरी है करना ही पड़ेगा नही तो इस पर लिखूंगा कैसे .खैर जाने दीजिये इन बातो को ये तो टेंशन में आदमी ऐसे ही लिखता रहता है .अब थोडी काम की बात हो जाए अरे पर यहाँ तो मुझे कुछ काम ही नही है ,सुबह उठ कर नहाना ,फिर कॉलेज जन नेट परसमय देना ,एक से एक खतरनाक क्लास करना यही तो है फिलहाल जिंदगी ,पर हाँ एक चीज़ है जो मुझे सोचने को कुछ देर तक विवश करता है वो तब जब मैं बस में सफर करता हूँ .उतनी भीड़ एक दुसरे के उपर आने को आतुर ,खैर बस है तो भीड़ तो होनी ही चाहिए नही तो काम नही चलेगा .मैं सोचता हु की यहाँ की जिंदगी क्या है क्या सोच कर महानगर में लोग आते है जिंदगी बिताने को वो बिता तो रहे है पर जो कल तक गावं में एक दूजे के लिए था वो अब अपने के लिए हो गया .यहाँ आने के बाद भूल जाते है लोग मानवता ,भाईचारा ,बंधुत्व और कितने उपमे से अलंकृत करू शायद कम पड़ जाए .मैं देखता हु की यहाँ जिंदगी है शाम या रात को घर आओ फिर खाना बनाओ फिर खाओ और फिर सुबह उठो और काम पर जाओ .फुरसत मांगे भी नही मिलती अरे कंपनी में और भी समय देना है पैसे की खातिर चाहए कुछ भी हो जाए देश फिर भी गरीबी में ही है .कहाँ से उपाय करे ,अरे मैं तो लग रहा है भटक गया मुद्दे से अरे यही तो होता है हर के साथ यहाँ ?
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