Oct 9, 2009

आडवाणी के सन्यास की घोषणा

बीजेपी में चल रही खीचतान के बाद जो सारे लोग एक आसरा लगाये बैठे थे की कब पार्टी में परिवर्तन होगा तो शायद उन लोगो के लिए एक राहत वाली बात सामने आ ही गए मैं यहाँ अडवाणी जी के बारे में ही कह रहा हु.आखिरकार उनके भरोसेमंद नायडू ने एक टीवी पर इस बात को खुलेआम स्वीकार कर लिया की अगले चुनाव में आडवाणी जी के नेतृत्व में चुनाव नही लड़ा जाएगा .इस बात को लेकर लोकसभा चुनाव के बाद ही कानाफूसी शुरु हो गए थी की इस चुनाव में पार्टी ने जो किसी एक पर ही मुख्य रूप से जो इतना बल दिया उसी का परिणाम सामने बीजेपी की हार का कारणबना .यहाँ पर एक बात और भी है की आडवाणी जी ने भी इस बात को कहीं न कहीं स्वीकार कर लिया की देश की ज्यादातर जनता को वे प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार्य नही है.आडवाणी जी ने राजनीती में आधी से भी ज्यादा जिंदगी बिता दी और अच्छे और बुरे का उन्हें एक बहुत ही शानदार अनुभव है,तो हो सकता है की उन्होंने सोचा होगा की अब जो है इस तरह के हालात से तो ठीक यही होगा की राजनीती से सन्यास ही ले लिया जाए .वही दूसरी तरफ़ संघ की ओर से भी इस तरह की बातें सामने आ रही थी की बीजेपी को अब किसी युवा नेतृत्व की जरूरत है ,ये बातें भी आडवाणी जी के लिया बहुत ठीक नही थी .एक बात जो हो सकता है संघ को या बीजेपी के लोगो को नागवार लग रहा था वो शायद ये था की अचानक आडवाणी जी उस हिंदुत्व की बात को लोगो के सामने नही कह रहे है जो वो पहले किया करते थे जिनसे उनको लोगो का बड़ा आर्शीवाद प्राप्त था .यहाँ पर एक बात ओर भी गौर करने लायक है की जिस तरह बीजेपी ने शिमला बैठक के समय जसवंत सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया क्या वही कुछ संघ के राजगीर में चल रहे बैठक का तो नही?खैर जो भी हो मुझे लगता है की आडवाणी जी के लिए सही समय है ओर पार्टी को मजबूत अगर बनाना है तो आडवाणी जी को इस चीज़ के बारे में सोचना ही होगा ओर पार्टी में कुशल लोग तैयार करना उनकी जिम्मेदारी होगी .

1 comment:

GAUTAM SACHDEV said...

This is the true love of politics that you for the betterment of politics and political ;condition of our country goes on writing .this is the spirit required in the quality of leading or leadership
warm style of writing
carry on